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भगवान श्री स्वामिनारायण का भब्य मंदिर - वाराणसी

भूतभावन भगवान भोलेनाथ की परमपावन मोक्षपुरी काशी नगरी में  मत्स्योदरी तीर्थ पर गायधाट महाँल की सीमा पर भगवान श्री स्वामिनारायण का मन्दिर अत्यन्त रमणीय एवं चित्ताकर्षक है । इस मन्दिर के पीछे दो सौ वर्ष का इतिहास है ।
पूरे गुजरात, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश एवं देश -विदेश में फैले हुए श्री स्वामिनारायण संप्रदाय की गुजरात राज्य में  दो प्रमुख गद्दी है । एक वडताल में एवं दूसरी अहमदाबाद में है । काशी स्थित श्री स्वामिनारायण मन्दिर वडताल की श्री लक्ष्मी नारायण देव की गद्दी के अंतर्गत है ।

इस मन्दिर का इतिहास इस प्रकार है - बचपन में भगवान श्री स्वामिनारायण का नाम घनश्याम था , संप्रदाय के श्री हरि दिग्विजय ग्रंथ एवं परम्परागत कथा  के अनुसार भगवान श्री स्वामिनारायण जब दस वर्ष के थे तब पिता धर्मदेव के साथ काशी आये थे और यहाँ के मणिकार्डिका स्थित प्रसिद्ध गौमठ  में ठहरे थे । यहॉ विद्वानों की सभा हुई  जिसमे बालक घनश्याम की विदत्ता देख कर सभी विद्वान अत्यंत प्रभावित हुवे थे | तत्पश्चात भगवान श्री स्वामिनारायण ने अपने पिता के साथ काशी के प्रसिद्द  मत्स्योदरी तीर्थ एवं गायधाट पर स्नान  किया | इसी पुण्य स्मृति में यह दिब्य मंदिर बना है |
मन्दिर के  लिए यह जमीन तो लगभग १५० बर्ष पूर्व ही ली गयी थी लेकिन आज से करीब ६० वर्ष पूर्व  ध. धु . १००८  आचार्य श्री  आनंद  प्रसादजी की आज्ञा से गुजरात के महान तीर्थधाम वडताल के मुख्य कोठारी स . गु . ब्र  स्वामी श्री धर्म स्वरुप दास जी और स . गु . ब्र श्री मायतीतानन्द जी के अतिभारी परिश्रम से  एवं त्यागी संतो की सहायता से तथा हरिभक्ती के आर्थिक मदद से तथा कोठारी श्री खुशाल भाई ने (उक्त महानुभावों की ) सुचना के अनुसार, स्वयं स्रर्वप्रकार से निर्माण कार्य को संभाल कर  इस तीर्थराज काशी में श्री स्वामिनारायण के शिखर बंध मन्दिर का निर्माण  मिस्त्री वजेशंकर लक्ष्मी शंकर के द्वारा कराके उसमे श्री हरिकृष्णा महाराज ( श्री स्वामिनारायण भगवान) श्री लक्ष्मी नारायण देव , श्री काशी विश्वनाथ महादेव की प्राण प्रतिष्ठा  विक्रम संबत १९९८ के वैशाख सूदी (५) पंचमी और सोमवार एबं ता. २४-४-१९४२ के दिन कराई  गयी है ||

इस मंदिर का प्रमुख उद्देश्य भगवान श्री स्वामिनारायण की काशी यात्रा की पुण्य -स्मृति का संरक्षण करना , यात्रियों की सेवा करना एवं भगवत अनुष्ठार्थि व तीर्थवास कर सके तथा संत , विधार्थीयों की ब्यवस्था  द्वारा  सदविद्या  का प्रचार करना है || सदूविद्या - प्रवर्तन से बढ़ कर ज्यादा पुण्यप्रद कोई सत् कर्म नहीं है, अर्थात इससे बढकर भगवत्

प्रसन्नता का कोई साधन नहीं हैं और श्री स्वामिनारायण संप्रदाय का पुरे विश्व के कोने कोने तक प्रचार करने में जिन महानुभाव विद्वान संतो ने प्रमुख भूमिका निभाई उन सभी विद्वान संतो ने इस श्री स्वामिनारायण  मंदिर मन्दिर के जो अपनी मातृ संस्था है, उसका आश्रय लेकर सदविद्या की प्राप्ति की है शिल्प स्थापत्य एवं सुंदरता की दृस्टि से  श्री स्वामिनारायण मंदिर   काशी के  प्रमुख चार-पाँच मन्दिरों में से एक है । सरसरी निगाह से देखने पर उत्तरऱभिमुख यह मन्दिर सुन्दर  रथाकार प्रतीत होता है । मन्दिर के चारों ओर भगवान् के प्रमुख अवतारों शंकर-पार्वती , सरस्वती, गंगा, यमुना, यम और वरुण की प्रतिमा चित्त क्रो आकर्षित करती हैं और मन्दिर के पाँच अनुपम शिखरों पर सुवर्ण कलशा के साथ फहराती ध्वजाएँ मुमुक्षवो को मोक्ष प्रदान करने के लिए मानो आहवान कर रही हो |

निज मन्दिर
मुख्य मन्दिर, जिसको निज मन्दिर कहते है-तीन शिखरों वाला है  जिसमें पूर्व खण्ड में श्री विश्वनाथजी एबं पार्वतीजी अर्चास्वरूप से मूर्तिमान विराजमान होकर भक्तों को
प्रतिदिन इक्छित सुख देते हुवे दर्शन दे रहे है मध्य खण्ड में भगवान श्री स्वामि-नारायण एवं भगवान श्री लक्ष्मी नारायण  देव पंचधातुओँ से निर्मित प्रतिमा स्वरुप से विराजमान हो कर दरसनार्थियो के मन को आकर्षित करते है और अपूर्व शांति प्रदान कर के भक्त के तीन - ताप को हर लेते है मंदिर के पश्चिम खंड में भगवान की सुख शय्या रखी गयी है और श्री राधा कृष्णा एवं भगवान श्री स्वामिनारायणका सुन्दर चित्र और सुखशय्या है | मंदिर में प्रति दिन भगवान का पूजन एवं नूतन शृंगार होता है | मंदिर के उत्तर में प्रवेश द्वार्की सोपान श्रेणी के पास श्री हनुमान जी एवं श्री गणेश जी के मंदिर में शिव - सूर्यनारायण आदि विराजमान है  | सर्व देवो के प्रति आदर भावना  श्री स्वामिनारायण संप्रदाय की प्रमुख विसेसता  है |
मंदिर में संत छात्रावास भी है , मंदिर के आगंतुक यात्रियों के लिए आवास का सुन्दर प्रभन्ध  भी है  और आधुनिक ढंग से विशाल नूतन अतिथि भवन का निर्माण भी हुवा है

| वर्तमान समय में ये भगवान श्री स्वामिनारायण  का भब्य मंदिर सुन्दर कलाकृति का अनुपम नमूना कहा जाता है..

Address :

Shree Swaminarayan Mandir - Kashi

K 1/1, Machhodari Park
Gayghat - 221 001
Kashi, Banaras
Uttar Pradesh(UP)
Tel: +91 542 2435492
India










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जानें, FB के कुछ ऐसे रोचक FACTS जिनके बारे में नहीं जानते होंगे आप



पिछले एक दशक से फेसबुक इंटरनेट की दुनिया पर एक बड़ा नाम बनकर उभरा है। इसके पीछे मार्क जुकरबर्ग का बहुत बड़ा हाथ है। फेसबुक के को-फाउंडर मार्क जुकरबर्ग आज (14 मई) को अपना 30वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस साल 4 फरवरी को फेसबुक ने भी अपने 10 साल पूरे कर लिए। पिछले कुछ समय से वेबसाइट पर जो बदलाव किए गए हैं उन्हें देखने पर लगता है कि मार्क के साथ-साथ फेसबुक वेबसाइट में भी मैच्युरिटी आ रही है।
फेसबुक पर 50 जेंडर ऑप्शन आने से लेकर, मोबाइल ऐप के प्रति रुझान, टीनएजर्स के लिए नए फीचर्स ये सब इसी बात की ओर इशारा करते हैं की फेसबुक भी अब बड़ी हो रही है।

इस होनहार बालक को इनके जन्म दिन पर हार्दिक शुभकामना !!

इसे हमारी भी उम्र लग जाए !!

इसने गांधी जी की तरह "बिना खडग बिना ढाल" कमाल कर दिया !!

इनके ही खोज से भारत में अच्छे दिन आने वाले हैं !! हम सभी भारतीय इनका हार्दिक अभिनन्दन करते हैं !!
बहुत बहुत धन्यवाद मार्क !! जियो हजारो साल !!


फेसबुक की अपनी एक अलग पहचान है। हमारे जीवन का एक हिस्सा बन चुके फेसबुक को लेकर कई ऐसी रोचक बातें छुपी हुई हैं जिनके बारे में जानकर आपको आश्चर्य होगा। शायद ये रोचक बातें आपको फेसबुक पर शेयर की हुई फोटोज से भी ज्यादा आकर्षित करें। क्या आप जानते हैं कि फेसबुक का रंग नीला क्यों है, या फिर फेसबुक पर अमेरिका की 83 प्रतिशत वेश्याओं के फैन पेज हैं। इतना ही नहीं आइसलैंड का संविधान भी फेसबुक की मदद से लिखा गया था।  

मार्क जुकरबर्ग के 30वें जन्मदिन के मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं फेसबुक से जुड़े कुछ FACTS


क्यों है फेसबुक का रंग नीला-

फेसबुक के नीले रंग में रंगे होने के पीछे सीधा सा कारण है। इसके फाउंडर मार्क जुकरबर्ग का कलर ब्लाइंड होना। न्यूयॉर्कर को दिए अपने एक इंटरव्यू में मार्क ने कहा की उन्हें लाल और हरा रंग दिखाई नहीं देता है। इसलिए नीला रंग उनके लिए सबसे आसान रंग है।

फेसबुक शुरू से ही एक ही रंग में रंगा हुआ है। मार्के इसे हमेशा से जितना हो सके उतना सादा बनाना चाहते थे। यही वजह है कि उन्होंने फेसबुक को नीले रंग में रंग दिया।

तलाक का सबसे आम कारण-

 2011 में डायवोर्स ऑनलाइन के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में फाइल किए गए सभी डायवोर्स में से एक तिहाई में तलाक लेने का कारण किसी ना किसी वजह से फेसबुक था। डायवोर्स ऑनलाइन के मुताबिक इस बात का दावा करने के लिए लोगों द्वारा अपने पार्टनर के चैट मैसेज, भद्दे कमेंट्स और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट सबूत के तौर पर पेश किए गए। सोशल मीडिया के आने से रिश्तों में बदलाव देखने को मिला है।


आइसलैंड का संविधान लिखा गया था फेसबुक की मदद से-

1944 में डेनमार्क से अलग होने के बाद आइसलैंड ने अपना संविधान कभी नहीं बनाया। यहां हमेशा से डेनमार्क के संविधान को ही माना जाता था। आइसलैंड ने 2011 में अपना संविधान दोबारा लिखने का फैसला लिया। इसके बाद 25 लोगों की एक काउंसिल बनाई गई जिसने फेसबुक का सहारा लेकर लोगों से सुझाव मांगे। इस काउंसिल ने अपना ड्राफ्ट जिसमें नियमों को लिखा गया था उसे फेसबुक पर पोस्ट किया। इस ड्राफ्ट पर लोगों ने अपने कमेंट्स किए लोगों के कमेंट्स और सुझावों के आधार पर ही आइसलैंड का संविधान बना जिसे बाद में फेसबुक पर पोस्ट भी किया गया।



फेसबुक पर मार्क का शॉर्टकट-

फेसबुक प्रोफाइल पर मार्क जुकरबर्ग के पेज तक पहुंचने का एक खास शॉर्टकट भी है। अगर आप फेसबुक के URL के आगे नंबर 4 लिख देंगे तो आपका ब्राउजर सीधे मार्क जुकरबर्ग के पेज तक ले जाएगा। मार्क ने 1 नंबर आईडी की जगह 4 नंबर आईडी चुनी है। मार्क के पेज के लिए www.facebook.com/4 URL लिखना होगा। ऐसे ही 5 और 6 नंबर URL के पीछे लगाने से आप क्रिस हग्स और डस्टिन मोस्कोविट्ज के पेज तक पहुंच जाएंगे। ये दोनों फेसबुक के सह-संस्थापक और मार्क के रूममेट्स हैं।


फेसबुक द्वारा हैकर्स को इनाम-

फेसबुक द्वारा हैकर्स को इनाम दिया जाता है। 500 डॉलर्स की राशि हर उस इंसान को दी जाती है जो फेसबुक को हैक कर सके। अगर आप फेसबुक की किसी गलती को भी पकड़ लेते हैं तो भी आप इनाम के हकदार होंगे। हालांकि, इस नियम के साथ फेसबुक की कुछ शर्तें भी हैं। बिना अपनी पहचान बताए हैकर को फेसबुक को 24 घंटों का समय देना होगा जिसमें फेसबुक अपनी गलती को सुधार ले।

83 प्रतिशत वेश्याओं के हैं फैन पेज-

फेसबुक पर 83 प्रतिशत वेश्याओं के फैन पेज बने हुए हैं। यह बात कोलंबिया यूनिवर्सिटी के एक रिसर्चर सुधीर वैंकटेशन ने सामने रखी थी। सुधीर की रिसर्च के मुताबिक पहले इन वेश्याओं ने खुद को क्रेगलिस्ट (Craigslist वेबसाइट) पर अडल्ट सर्विस कैटेगरी में रखा था इसके बाद ट्रेंड के बदलते ही यह सभी फेसबुक पर चली गईं।


फेसबुक पर अनफ्रेंड करने पर उतारा मौत के घाट-

फेसबुक की वजह से जुर्म भी होता है। इस बात का सबूत है अमेरिका के टेननेसी(Tennessee) में हुई हत्या। बिली क्ले और बिली जीन नाम (Billy Clay Payne Jr. और Billie Jean Hayworth) को जेनेले पोर्टन नाम की एक महिला को फेसबुक से अनफ्रेंड करना भारी पड़ गया। महिला के पिता ने इस बात से खफा होकर दोनों पति-पत्नी को मार दिया। इस घटना में उनका 8 महीने का बच्चा बच गया।
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Hindi Poem on Banaras (खिड़की में गंगा, गंगा में नाव)

खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

कुछ समझे है मंजिल, कुछ समझे पड़ाव
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

किसीको धर्म खीच लाया, किसीको भंगेड़ी लगाव
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

कोई झुक के आया, कोई दीखता है ताव
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

रबड़ी दीवाना, मलईयो पे झुकाव
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

कोई जवानी में आया, कोई बुढ़ापे की छाव
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

कम करो चिंता, थोड़ा मुस्काओ
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

तट पे मरमम्त, मरमम्त पे नाव
मरमम्त हुई नाव, तभी तो तैराओ
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

ब्लू हुई लस्सी, बिल हुआ अस्सी
बिल की न चिंता, हमको जी पिलाओ
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

मंसूर भाई आना, कबूतर मिला दाना
पास न जाओ, कबूतर न उड़ाओ
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव

कचौड़ी गली और जलेबी भी ली
ठठेरी बजार में रबड़ी मिली
काजू गजक ने मिटाई कसक
जिसकी तमन्ना गजक
केदार घाट की सीडी लपक
चाट चटोरे
शहर के बटोरे
नारियल बाजार में सब मिलो रे
स्वाद मैंने चखे
थोड़ा तुम भी चखो रे
नाव गई गंगा में खाने हिलोरे
गर कही न मिलू
घाट है चेत सिंह
मुझे वही मिलो रे

घाटो पे सुबह सुहानी
गलियों की शाम दीवानी
तो क्यों पालू चिंता क्यों पालू तनाव
खिड़की में गंगा, गंगा में नाव 



शशि की कविताये

BY : शशिप्रकाश सैनी
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काशी विश्वनाथ के साक्षात दर्शन (Shri Kashi Vishwanath Mandir - Live!!)



दर्शन के लिए यहाँ क्लीक करे


Watch Live Online Darshan of Kashi Vishwanath Temple



Shri Kashi Vishwanath Temple in Varanasi, dedicated to Lord Shiva, is one of the most famous Hindu temples in the world. Shri Kashi Vishvanath Mandir authorities have now made arrangements for online live darshan of the Shivling worshipped in the Varanasi Kashi Viswanath Temple.


Note: The live darshan can only be seen through the Internet Explorer Browser. The live streaming does not support Firefox, Chrome and Opera browsers.
The live darshan is on the Windows Media Player and you will need it to have enabled in your browser. Usually this option is automatically enabled in most browsers.
Please note that the online live darshan of the Shivling at Kashi Vishwanath Temple will be obstructed by devotees present there and therefore you will need tons of patience to have a proper glimpse. The live streaming depends on the speed of your internet connection.
The online live darshan is only available when the temple is open.
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संकट मोचन मंदिर -वाराणसी


जिंदगी जब तक रहेगी ,फुर्सत न होगी काम से,
कुछ समय ऐसा निकालो,प्रेम कर लो श्री राम से !!

Sankat Mochan temple is one of the sacred temples of Varanasi. It is located in the southern part of Varanasi, near the Banaras Hindu University. It is dedicated to the Hindu God, Hanuman. The word "Sankat Mochan" means one who helps in removing sufferings i. e. Lord Hanuman. Tulsidas, the author of the famous Hindu epic Ramacharitamanasa, founded the Sankat Mochan temple. According to Hindu mythology, one who visits the Sankat Mochan temple regularly, his wishes get fulfilled.

Every Tuesday and Saturday, thousands of devotees queue up in front of the Sankat Mochan temple to offer prayers to Lord Hanuman. According to Vedic Astrology, Hanuman protects human beings from the anger of planet Saturn and those who have ill placed Saturn in their horoscope visit the Sankat Mochan temple to get remedy. People put "Sindoor" on the statue and offer "laddoos" to Lord Hanuman. The "Sindoor", from the statue of Lord Hanuman is put on the foreheads of devotees.
 
 
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यात्रा काशी दर्शन (शिव की नगरी बनारस)".


यह लेख काशी  के बारे में है। 


काशी के कई अर्थ हो सकते हैं:

  • काशी: पौराणिक हिन्दू नगरी।

  • वाराणसी: वर्तमान हिन्दू धार्मिक नगरी

काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित पौराणिक नगरी है। इसे संसार की सबसे पुरानी नगरी माना जाता है।


विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है - 'काशिरित्ते.. आप वकाशिनासंगृभीता:'। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरिके आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदुसरोवरबन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। ऐसी एक कथा है कि जब भगवान शंकर ने क्रुद्ध होकर ब्रह्माजी का पांचवां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षो तक अनेक तीर्थो में भ्रमण करने पर भी वह सिर उनसे अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड़ दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थ कहलाया। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजी से अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गई।


मान्यता

एक अन्य कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदासने गंगातटपर वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को अपने मायके (हिमालय-क्षेत्र) में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्धक्षेत्रमें रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रियलगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आकर रहने लगे। राजा दिवोदासअपनी राजधानी काशी का आधिपत्य खो जाने से बडे दु:खी हुए। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान मांगा- देवता
देवलोक में रहें, भूलोक (पृथ्वी) मनुष्यों के लिए रहे। सृष्टिकर्ता ने एवमस्तु कह दिया। इसके फलस्वरूप भगवान शंकर और देवगणोंको काशी छोडने के लिए विवश होना पडा। शिवजी मन्दराचलपर्वत पर चले तो गए परंतु काशी से उनका मोह भंग नहीं हुआ। महादेव को उनकी प्रिय काशी में पुन:बसाने के उद्देश्य से चौसठ योगनियों,सूर्यदेव, ब्रह्माजीऔर नारायण ने बडा प्रयास किया। गणेशजीके सहयोग से अन्ततोगत्वा यह अभियान सफल हुआ। ज्ञानोपदेश पाकर राजा दिवोदासविरक्त हो गए। उन्होंने स्वयं एक शिवलिङ्गकी स्थापना करके उसकी अर्चना की और बाद में वे दिव्य विमान पर बैठकर शिवलोक चले गए। महादेव काशी
वापस आ गए।

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Water Park in Varanasi

Water Park in Varanasi situated on the Varanasi-Allahabad highway, from Varanasi railway station it will take 15 minutes to reach that place. Place is nearby Lahurabir a well known place in Varanasi. This water park has four main slide and some other stuff also but there one large pool which make it more interesting. Water park is open from the month of February and it been opened till the month of November. The opening time of the park is 11 A.M. and the closing timing is 5 P.M. The entrance charges of the water park is 150 for the adults and for the children it been 125. There some offer also engaged by owner if you come in a group of 15 or more they might give discount to that group. There a safety group in the water park who do take care of children. When you have ticket they will allow you to enter in the park and ask you to have dress up with some suitable clothes like trousers so that you don’t get injured anyways. They will offer you but they do charges for it but you can bring it from your home also. There are some good restaurants also just near by the park so you can have fun of both having fun in water park and then a good lunch in a restaurant or hotel.


 


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Malviya Bridge

Malviya Bridge, inaugurated in 1887 (originally called The Dufferin Bridge) is a a double decker bridge over the Ganges at Varanasi. It carries rail track on lower deck and road on the upper deck. It is one of the major bridges on the Ganges and carries the Grand Trunk Road across the river. It has 7 spans of 350 ft and 9 spans of 110 ft long and it was the first bridge of its type constructed in the Indian sub-continent by the engineers of Oudh and Rohilkhand Railway Company (O&R Railway). The Bridge was renamed as Malviya Bridge in 1948 after Madan Mohan Malaviya. As the bridge is near Rajghat, it is also locally known as Rajghat bridge

Malviya Bridge

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बनारसीपन यानी मौज-मस्ती का दूसरा नाम

बनारसीपन यानी मौज-मस्ती का दूसरा नाम। शायद ही वर्तमान समय की इस दौड़भाग भरी जिंदगी में कहीं लोगों को मौजमस्ती के लिए भरपूर फुर्सत मिलती हो लेकिन काशीवासी इस मामले में धनी हैं। तमाम काम के बावजूद लोग अपने और दूसरों के लिए समय निकाल ही लेते हैं। वहीं, काम के दौरान माहौल को हल्का फुल्का बनाने की कला बनारसियों का स्वाभाविक गुण है। महादेव की नगरी में बिना भांग खाये भी लोगों के बातचीत का लहजा अल्हड़पन लिए रहता है। एक बात जो बनारसियों के मौजमस्ती का ट्रेडमार्क बन गयी है वह है गंभीर से गंभीर मसले पर भी मुंह में पान घुलाते हुए बात करना। इस दौरान यदि मुंह से पान की लाल छीटें सफेद कुर्ते या शर्ट पर गिर जाये तो बनारसी स्टाइल में चार चांद लग जाता है।
भले ही कहा गया हो कि सबहे बनारस और शामें अवध लेकिन वास्तविकता तो यह है कि बनारस की सुबह जितनी खूबसूरत होती है उससे भी अनोखी, अदभुत और चकाचौंध करने वाली यहां की मदमस्त शाम है। काशी में जैसे-जैसे सूरज ढलता है शाम और हसीन और रंगीन होती जाती है। जीवनदायिनी मां गंगा के सुमधुर कल-कल करते जल और उसपर पड़ता घाटों पर लगे हाईमास्ट लाइटों की परछाईं पानी में पड़ती है तो घाट पर बैठे लोग उत्साहित हो जाते हैं। जिसका लुत्फ उठाने के लिए बनारसी समय निकाल ही लेता है। मौजमस्ती का आलम बानरस में इस कदर रहता है कि चाय की दुकानों पर एक पुरवे गरम चाय को पीते-पीते घंटों गुजार देना बनारसी मौज मस्ती का जीवंत उदाहरण है। वहीं, चाय वाला भी गप लड़ा रहे लोगों को दुकान से जाने के लिए नहीं कहता है बल्कि गप्पेबाजी में खुद भी सहभागिता कर माहौल का आनंद उठाता है। बनारसीपन के इस खास अंदाज और देशीपन से ही वह कहीं रहे आसानी से पहचाना जा सकता है। बातचीत में 'गुरू' 'मालिक' 'बाबा' 'महराज' जैसे शब्दों का प्रयोग आम बनारसी करता ही है। बाइक पर चलते हुए सकरी गलियों के भीड़भाड़ के बीच जाते हुए पीछे से सांड़ को छेड़ना बनारसियों के आदत में शुमार है। कहा जाता है कि बनारसी प्रतिकूल हालात में भी सामान्य रहते हैं। यहां शोक नहीं उल्लास है। जन्म से लेकर मृत्यु तक काशी में संगीत बजता है। यही तो है काशी जहां बाहर से आने वाले का मन बिना दिखावटी आकर्षण के भी रम जाता है। बनारस की मौज मस्ती को खास दायरे में बांधा नहीं जा सकता है क्योंकि यहां राह चलते भी मौज मस्ती है। फिर भी कुछ प्रमुख तरीके से लोग मौज मस्ती करते हैं।

1- साफा पानी- काशी में साफा पानी ऐसी क्रिया है जो हर आम बनारसी करता है। साफा पानी के तहत स्नान, व्यायाम, कपड़ा सफाई होती है। यानी दैनिक काम को भी बनारसी मौजमस्ती से जोड़कर करता है। जिससे काम बोझ नहीं बल्कि आनंद का बोध कराते हैं।
2- रोगन पानी- यह शब्द भी बनारसी मौजमस्ती का प्रतीक है। रोगन पानी का मतलब है तेल मालिश, श्रृंगार इ़त्र लगाना और घूमने निकल जाना है।
3- माल पानी- माल पानी यानी धन कमाना या कमाई करना है। बनारसी धन कमाने को भी हल्के-फुल्के अंदाज में मालपानी का नाम देता है।
4- माझा पानी- बनारसी किसी बात को घुमा फिरा कर कहने की बजाय अपनी बात बेबाकी और आसानी से कहता है।
5- मौज पानी- भांग, ठंडई, पान, रबड़ी, मलाई, कचौड़ी जलेबी, लस्सी का सेवन बनारसी मौज मस्ती का अभिन्न अंग है।
6- माचा पानी- बात-बात पर अपनी शेखी बघारना एवं दूसरों को मूर्ख बनाना बनारसियों की खास पहचान है।
7- रंग पानी- यह शब्द भी मौज मस्ती से ही जुड़ा हुआ है। यहां की अक्खड़ता बनारसी रंग लोगों पर आम रहती है।
8- बाहरी अलंग- काशी की मौज मस्ती में बाहरी अलंग का अपना अलग महत्व और आकर्षण है। जिसका आनंद लगभग हर बनारसी उठाता हैं। बाहरी अलंग के तहत सभी तरह के मानसिक और शारीरिक तनाव को दूर करने के लिए बाहर घूमने जाते हैं। पहले बनारसी बाहरी अलंग करने गंगा उस पार रेती पर जाकर नित्य क्रिया के बाद गंगा में स्नान, ध्यान के करने के बाद ठंडई के साथ वहीं पर बाटी लगाकर खाते थे। जिससे लोग तरोताजा हो जाते थे। वर्तमान समय में बाहरी अलग का स्वरूप थोड़ा बदल गया है। अब काशी वासी उस पर रेती पर जाने के अलावा रामनगर, राजदरी, देवदरी, समेत शहर से दूर शांत व प्राकृतिक स्थलों पर पिकनिक मनाने जाते हैं। इस दौरान वहीं पर कुछ लोग बाटी चोखा बनाते हैं तो ज्यादातर लोग कोल्ड ड्रिंक के साथ चिप्स खाते हुए चाय पीते हैं।
9- गहरेबाजी- बनारस में मौजमस्ती का प्रतीक गहरेबाजी भी रहा है। बनारसी पूरे उत्साह के साथ भांग छान, माथे पर टीका कन्धे पर गमछा कान में इत्र लगाकर गहरेबाजी में भाग लेता है।
10- सांड़बाजी- बनारस की सड़कों पर मदमस्त सांड़ों को कहीं भी विचरते देखा जा सकता है। स्वभाव से विपरीत यहां सांड़ लोगों पर धावा नहीं बोलते लेकिन जब दो सांड़ों का आमना-सामना जंग में बदल जाता है तो लबे सड़क लोग रूककर सांड़ों की जोरआजमाइश का मजा लेते हैं और अपने खास अंदाज में 'जियो बेटा' की आवाज लगाते हुए सांड़ों को और भड़काते हैं। इस दौरान उन्हें ऑफिस के लिए भले ही देर हो जाये उसकी परवाह कोई नहीं करता।
11- मंदिर में दर्शन व कचौड़ी जलेबी का मजा- बनारसी सुबह जल्दी उठकर मंदिरों में दर्शन करने के बाद दुआ सलाम करते हुए परिचित दुकान पर जलेबी कचौड़ी का मजा लेता है।
12- अड़ीबाजी- चायपान की दुकानों पर आम बनारसी जमकर अड़ीबाजी करता है। चाय की चुस्की के साथ शुरू हो जाती है धर्म, अर्थ, खेल, राजनीति जैसे अन्य विषयों की चर्चा। इस दौरान कोई देश का प्रधानमंत्री कैसा है पर बहस करता है तो कोई किसी की सरकार बातों से ही बना देता है। इस दौरान कब घंटे दो घंटे यूं ही बीत जाते हैं लोगों को पता ही नहीं चलता है।
13- घाटों पर घूमना- शाम ढलने के साथ ही बनारसी मौजमस्ती को खोजने घाटों की तरफ बढ़ने लगते हैं। घाटों की सीढ़ियों पर बैठकर गंगाजी के प्रवाहमान जल को निहारता हुए प्रसन्न होता है।
14- मॉल कल्चर- काशी में पारंपरिक मौजमस्ती की कड़ी में अब आधुनिक मॉल कल्चर भी शामिल हो गया है। मॉल में जाकर घूमना कोल्ड ड्रिंक के साथ पॉपकार्न खाना फिल्में देखना लोगों के मौजमस्ती का जरिया बन गया है। खासकर युवा वर्ग मॉल में जाना अधिक पसंद करता है।
सिनेमा का फलता-फूलता बाजार : काशी
लाइट, कैमरा, एक्शन! जी हाँ काशी में फिल्म निर्माण अब आम बात हो गई है। लागा चुनरी में दाग, गैंग्स ऑफ वासेपुर, मोहल्ला अस्सी, यमला पगला दीवाना, राँझणा जैसी आधुनिक फिल्में काशी की पृष्ठभूमि पर बनीं। फिल्मों का मात्र एक कोना है। सिनेमा का आधुनिक दौर काशी को फलते-फूलते बाजार की कसौटी पर कस रहा है। आइए काशी के सिने मार्केट से अवगत होते हैं।
काशी में सिनेमा जगत का प्रारम्भिक दौर-
वास्तव में फिल्मिस्तान के मूलतः दो ही केन्द्र हैं, बाम्बे और मद्रास। (1975) में वाराणसी के कुछ निर्माताओं ने प्रयोग के तौर पर दंगल नामक भोजपुरी फिल्म का निर्माण किया, जिसमें उन्हें अशातीत सफलता मिली।
काशी में फिल्मों के उन्नायक- आगा हश्र काश्मीरी- आगा हश्र काश्मीरी के पिता मूलतः काश्मीरी थे, तथा काशी में शाल का व्यापार करने आये और यहीं के बाशिन्दे हो गये, वाराणसी में थियेटर युग की समाप्ति के बाद मदन थियेटर के फिल्म 'समाज का शिकार' उर्फ 'भारतीय लक' का दिग्दर्शन किया। आगा जी गीत, संवाद, कहानी लेखन में अति महत्वपूर्ण रहे। 'पाक-दामन' 'बिल्व मंगल', आँख का नशा' 'हिन्दुस्तान', यहूदी की लड़की', 'शीरी-फरहाद' 'भीष्म प्रतिज्ञा' उनके द्वारा लिखी महत्वपूर्ण फिल्में हैं।
कुन्दन कुमार- कुन्दन कुमार ने 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैबे, 'लागी नाही छूटे राम', 'भौजी' (भोजपुरी) 'अपना पराया', 'फौलाद' 'परदेशी', दुनिया के मेले आदि फिल्मों का निर्माण व निर्देशन कर काशी का मान संवर्द्धन किया।
अरविन्द सेन- अरविन्द सेन ने 'चौबे जी', अमानत', 'काफिला', 'मुकद्दर', 'जमाना', 'जालसाज', 'मेरे अरमाँ', 'मेरे सपने', 'मर्यादा', 'अतिथि', 'कसौटी', 'नसीहत', आदि फिल्मों का निर्माण निर्देशन कर काशी को गौरवान्वित किया।
देवी शर्मा- वाराणसी के ही देवी शर्मा ने 'गुनाहों का देवता' काली टोपी लाल रूमाल, गंगा की लहरें, सुहागरात, नाचे नागिन बाजे बीन का सफल निर्देशन किया।
कनक मिश्र- काशी के फिल्म निर्देशक कनक मिश्र ने जियो तो जियो, 'सावन को आने दो' जैसी सुपरहिट फिल्मों का निर्माण किया।
प्रेमचन्द- प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द आगा हश्र के बाद काशी सिने साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आप अजंता मिनोटोन के आह्वान पर मुम्बई गये 'गरीब-मजदूर', 'सेवा-सदन' 'बाजारे हुस्न', 'तिरिया चरित', 'स्वामी', 'रंगभूमि' लिखी। दूसरे नामों से भी फिल्में लिखीं तथा मरणोपरान्त 'गोदान', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'निष्कृति' पर फिल्में बनीं।
अन्य फिल्म निर्देशक- वाराणसी के सिने परम्परा में गोपाल मोती व ज्ञानकुमार ने मीनू, एस0एन0 श्रीवास्तव ने 'विद्यार्थी' ओमप्रकाश जौहरी ने 'एक सूरत दो दिल', त्रिलोक जेटली द्वारा 'गोदान' ए0के0 गुप्ता की चिमनी का धुआँ, सुन्दर दर की सोरहो सिंगार कर दुल्हनियाँ आई इसके अतिरिक्त द्वारिकादास, ज्ञान चन्द्र श्रीवास्तव, प्रभाकर सिंह जैसे निर्देशकों ने काशी फिल्म को पुष्पित-पल्लवित किया।
काशी की अभिनय परम्परा- भले ही काशी का कोई कलाकार सुपरस्टार नहीं हुआ लेकिन कन्हैया लाल, लीला मिश्रा, कुमकुम, मोनिका, अम्बिका वर्मा, सुजीत कुमार पद्मा खन्ना, साधना सिंह, नारायण भण्डारी, मधु मिश्रा, जे0 मोहन, देव मल्होत्रा, केवल कृष्ण, रत्नेश्वरी, रामचन्द्र विश्वकर्मा, पूनम मिश्र, सोनी राठौर, त्रिभुवन बच्चन, अशोक सेठ, संजय ने अमिट छाप अभिनय में छोड़ी।
फिल्मी संगीत निर्देशन वादन- पं0 रविशंकर व पं0 एस0एन0 त्रिपाठी ने चिरस्मरणीय फिल्मी धुनें बनाईं तथा फिल्मी संगीत में शास्त्रीय धुनों का सम्मिश्रण किया। फिल्म 'गूँज उठी शहनाई' में बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई, पं0 किशन महराज, पं0 शामता प्रसाद उर्फ गुदई महराज द्वारा फिल्मों में झंकृत कर देने वाला तबला वादन अविस्मरणीय है। संगीतकार हेमन्त भी काशी की धरती का धूल माथे पर लगाये बिना नहीं रह सके।
नृत्य एवम् नृत्य निर्देशन- वाराणसी की तारा, सितारा व अलकनन्दा बहनों ने नृत्य विधा में धूम मचाकर नृत्य कौशल को नई कसौटी में कसा। बेहतरीन नृत्य निर्देशिका अन्नपूर्णा 'रजिया सुल्तान' फिल्म में अनुबन्धित होने के कुछ समय बाद ही दिवंगत हो गई। माधव किशन जाने-माने नृत्य-निर्देशक रहे। नर्तक रामकृष्ण, सोनी राठौर तथा पूनम मिश्र ने भी नृत्य निर्देशन में एक अलग पहचान बनाई है।
गायक-गायिका- बनारस घराने की गायिका राजकुमारी ने फिल्म 'महल' तथा गायिका गिरजा देवी ने फिल्म 'याद रहे' में गाना गाया। मदन विश्वकर्मा ने कई भोजपुरी फिल्मों में गीत गाये।
गीतकार- अनजान बनारस के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और सफल गीतकार रहे, जिन्होंने 'खई के पान बनारस वाला' जैसे गीत रचना से एक अलग मुकाम हासिल किया। इनके पुत्र समीर की बॉलीवुड गीतकारों में तूती बोल रही है।
बी-बी मौजी, भोलानाथ गहमरी, मधुकर बिहारी, डॉ0 नामवर सिंह ने भी गीत रचना में सराहनीय प्रयास किये।
फिल्म समीक्षा व प्रचार-प्रसार- काशी में दिनेश भारती, कुमार विजय, भोलानाथ मिश्र, बंशीधर राजू, शेखर धोवाल नामक व्यक्तियों ने समुचित फिल्म समीक्षा एवम् गीतकार अनजान के भाई गोपाल पाण्डेय सफल फिल्म जनसम्पर्क अधिकारी रहे हैं। फिल्म प्रचार एवम् छायांकन में धीरेन्द्र, किशन व बृजकुमार ने अच्छा नाम कमाया।
भोजपुरी फिल्मों का दौर काशी में- भोजपुरी फिल्मों का दौर 1975 से 'दंगल' से शुरू हुआ। काशी में निर्मित भोजपुरी फिल्मों की श्रं'खला इस प्रकार है।
'दंगल', 'माई क।़ लाल', 'धरती मइया', 'गंगा मइया भर द अचरवा हमार', 'सोनवा क।़ पिंजरा', 'गंगा किनारे मोरा गांव', 'नैहर की चुनरी', 'वेदना', 'भारत की सन्तान', 'सिन्धुरवा भइल मोहाल', 'बसुरिया बाजे गंगा तीर', 'पान खाये सैयाँ हमार', 'आँगन की लक्ष्मी', 'दुलहिन', 'किस्ती किनारा', 'बैरी कॅगना', 'ससुरा बड़ा पइसा वाला', आदि।
टी0वी0 सीरियल- गंगाघाट, गंगा के तीरे-तीरे, रंग ली चुनरिया रंग में, सजाय द।़ मॉग हमार, माई क।़ ऍचरा, भारत की संतान, गंगा जइसन भौजी हमार, घर गृहस्थी, चम्पा-चमेली, गंगा मइया भर द।़ गोदिया हमार, सबै नचावत राम गोसाई, गंगा माई, गंगा दर्शन, सुबहे काशी आदि बनारस के प्रमुख सीरियल हैं।
फिल्म वितरक कम्पनी- ए0जी0 फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स, देवी पद्ममावती फिल्म्स, श्री विन्ध्याचित्रम्, सरोज फिल्म्स, लाईट ट्रेडर्स, रवि फिल्म्स, ए0के0 डिस्ट्रीब्यूशन, फिल्म एण्ड फिल्मको, काशी फिल्म्स, सरोज फिल्म्स, राजकमल डिस्ट्रीब्यूटर, ए0के0 डिस्ट्रीब्यूटर आदि प्रमुख वितरण कम्पनियाँ हैं। फिल्म वितरण का केन्द्र काशी के होने से अब दिल्ली, यू0पी0 टेरिटरों जो एक में है, दो भागों में बाँटने की बात चल रही है।
फिल्मी पत्रिका- श्रीमुन्नू प्रसाद पाण्डेय ने उत्तर-प्रदेश का पहला फिल्मी साप्ताहिक पत्र 'रम्भा' का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्र अब भी काशी का एक मात्र फिल्मी पत्र है।
सत्यजीत राय और काशी का फिल्मांकन- सत्यजीत राय का प्रथम बनारस आगमन 'पथेर पांचाली' सिरीज की फिल्म 'ओपुर संसार' की शूटिंग के दौरान हुआ थ। इस फिल्म में बनारस की सही जानकारी न होने के कारण 'जय बाबा फेलूनाथ' की शूटिंग के दौरान 16 दिन वाराणसी में रहे।

ओपुर संसार में बनारसी गालियों-घाटों के साथ-साथ 'जय बाबा फेलूनाथ' में बनारस की अलग-अलग विशेषताओं का प्रभाव है। वे बनारसी स्थानीय भित्ति चित्र से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी किताब 'एकेई बोले' शूटिंग के फेलूदार शंगे काशी ते' में उल्लेख हुआ है। बनारसी साड़ों को भी उन्होंने अपनी फिल्म में जगह दी। सत्यजीत राय के अनुसार बनारसी फिल्मों का एक अलग मिजाज है।
- अभिनव पाण्डेय



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बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
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काल हर !! कष्ट हर !! दुख हर !! दरिद्र हर !! हर हर महादेव !! ॐ नमः शिवाय.. वाह बनारस वाह !!