बनारस की सुबह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यहां की सुबह देखने के लिए विदेशों से भी मेहमान खींचे चले आते हैं। कुछ साल पहले ही शासन ने 'सुबह-ए-बनारस' को खास बनाने के लिए वाराणसी के अस्सी घाट पर ऐसे कार्यक्रम की शुरुआत की जिसमें बनारस की संस्कृति के साथ-साथ वाराणसी की पहचान भी लोगों को देखने को मिले।
हर सुबह बनारस में गंगा किनारे आरती और शास्त्रीय संगीत की धुन बरबस ही सैलानियों को आकर्षित करती है। अस्सी घाट का सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘सुबह-ए-बनारस’ अस्सी घाट पर आयोजित संगीत समारोह सुबह-ए-बनारस की शान की शान है। यह घाटों की ठाठ में चार-चांद लगा रहा है। सुबह के रागों पर आधारित यह आयोजन होता है। यहां बेहद आकर्षक नृत्य का कार्यक्रम होता है। यह कार्यक्रम भारतीय संस्कृति व परंपरा को बढ़ावा देने वाला है।इसकी थीम जापान के शिन्तो धर्म से प्रेरित है शिन्तो अर्थात कामियों का मार्ग। जापान का एक प्रमुख और मूल धर्म है। इसमें कई देवी-देवता हैं जिनको कामी कहा जाता है। कामी का अर्थ महान, अद्भुत, पवित्र जीव होता है। हर कामी किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। एक जमाने में शिन्तो धर्म जापान का राजधर्म हुआ करता था। इसका जापान के सांस्कृतिक, धार्मिक विकास, राष्ट्रीय जीवन में स्थिरता लाने में महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदू धर्म की तरह इसमें भी अनेकेश्वरवाद को मान्यता मिली है। अनेक देवी देवताओं के समूह पूजे जाते रहे हैं जिनमें ‘अनाटेरा सुओमी कामो’यानी सूर्य-देवी को प्रमुखता दी गई है।
जब से सुबह-ए- बनारस कार्यक्रम शुरू हुआ है बनारस के सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर तब से यही हाल है, कार्यक्रम से जुडे कई लोग हैं जो क्षेत्र विशेष (घाट) को अपने बाप की बपौती समझते हैं.... सुनने में तो अब यह भी आ रहा है कि वहां कोई भी अब कार्यक्रम होता है तो सुबह-ए- बनारस के लोग कार्यक्रम स्थल को अपनी बपौती बताकर मोटी कमाई करते हैं..और हो सकता है कि गरीब बच्चों को पढाने वाले लोगों द्वारा इनको पैसा ना देना खल रहा हो इसलिए ये लोग इस नेक काम में व्यवधान उत्पन्न कर रहे हो..
रत्नेश वर्मा जिला सांस्कृतिक समिति के सचिव है शुरु में जिला प्रशासन से धन मिलता था अब वो बंद है ! अब यह सब " सुबह-ए- बनारस आनन- कानन " नाम से रजिसट्रेशन करवा कर सदस्यता शुल्क ५ हजार लेते है और कोई सोशल कार्यक्रम अस्सीघाट पर करने आता है तो उससे पैसा लेते है ! जो नही देता उसको अनुमति का भय दिखाकर भगा देते है ! इसके पहले सब बजडा सुसज्जित करवा कर २५ सौ प्रति आदमी से लेकर नौका विहार कराते थे लेकिन मल्लाहों के विरोध के कारण सब बंद कर दिए उसका ताजा हाल ये है की सुबह-ए- बनारस डाल रहा है गरीब बच्चों के शिक्षा में बाधा
इनरव्हील क्लब उदया (यह संस्था है महिलाओं का) ओर से अस्सीघाट पर गरीब बच्चों के लिए पीएम की महत्वाकांक्षी योजना के तहत चलाये जा रहे नि: शुल्क साक्षरता कार्यक्रम में सुबह- ए-बनारस के जिम्मेदार लोग बाधा पहुंचा रहे है | अस्सीघाट पर प्रतिदिन सायं ६ से ७ बजे तक ३५ गरीब बच्चों को जो स्कूल नहीं जाते है उन्हें संस्था की महिलाए सभी पाठ्य सामग्री नि: शुल्क मुहैया करा कर बेसहारा बच्चों शिक्षित करने का अभियान चलाया हैं | उपरोक्त कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ गत २० मार्च को बीएचयू के कुलपति प्रो जी सी त्रिपाठी के मुख्य आतिथ्य में हुआ था | बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देने वाले संस्था कि महिलाओं ने यह आरोप लगाया है कि अस्सीघाट पर सुबह-ए- बनारस के एक जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा प्रतिदिन किसी न किसी तरह से इस नेक कार्य में बाधा डाली जा रही है | यह कहा जा रहा है कि बिना मेरी अनुमति के इस घाट पर कोई भी सामाजिक कार्य नही किया जा सकता है | साथ ही अब यह भी कहा जा रहा है कि यह कार्य परिसर से बाहर किया जाय जबकि घाट सार्वजनिक होता है कोई परिसर नही है | इस मामले कि शिकायत महिलाओं ने स्थानीय पार्षद श्री गोबिन्द शर्मा से शिकायत की तो पार्षद ने तत्काल इस घटना की जानकारी जिलाधिकारी श्री राजमणि से की | इस पर डीएम ने हर संभव गरीब बच्चों को नि: शुल्क साक्षरता अभियान से जोडने के लिए सहयोग एवं मदद करने का भरोसा दिया | ज्ञातव्य है कि सुबह-ए- बनारस कार्यक्रम के लिए महज २ घंटे के लिए प्रशासन से अनुमति है जबकि इस भीषण गर्मी में देश- विदेश से आने वाले पर्यटकों को काफी परेशानीयों का समना करना पड रहा है क्योकि नये अस्सीघाट पर पर्यटकों के लिए बने दोनों आश्रय स्थल पर २४ घंटे सुबह-ए- बनारस का कब्जा रहता है | इसके पूर्व वाराणसी विकास प्राधिकरण ने सुबह-ए- बनारस द्वारा अवैध रुप से आश्रय स्थल पर बने चबुतरे को तोड भी दिया था इसके बावजूद वहां फिर से अतिक्रमण कर चबुतरा बना दिया गया है | इस मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है |
वहां चाय की दूकान आर्थिक लाभ के लिए जब खुलवाई जा सकती है तो बेसहारा बच्चों को एक घंटा नि: शुल्क शिक्षा क्यों नहीं दी जा सकती है | समर कैंप तो रईसों के बच्चों के मनेरंजन के लिए घाटों पर लगाये जाते है ताकि उसका आर्थिक लाभ लोग उठा सकें
एक संस्कृति से जुडा हुआ मामला है तो एक देश के शिक्षा से... इसमें शाशन को अपने और से पहल करनी होगी... इस शिक्षा अभियान को भी सुबहे बनारस में जोड़कर जिलाधीश महोदय द्वारा सुबहे बनारस को सार्थक बनाना चाहिए।इस सन्दर्भ में क्षेत्र के कई बुद्धिजीवी भी अपनी सेवाएं निशुल्क देना चाहते हैं।किन्तु कुछ खास दबंगों द्वारा सुबहे बनारस को अपनी जागीर समझने से वे निराश हैं।
।। निराला ।।
बनारसी किसी को निराश नहीं करते. हताश नहीं करते. मान- मर्यादा का खूब
ख्याल रखते हैं. परंपरागत तौर पर. पीढ़ियों से. बनारस का यह स्वभाव उसके
स्वाभाविक गुणों में है, दिखावे के लिए नहीं. इसे पतियाने के लिए किसी पान
की दुकान पर जा सकते हैं.हर पान की दुकान पर पानी का एक टब रखा हुआ
मिलेगा. साथ में लोटा भी. और दुकानदार पान देने के पहले कहेगा-‘ठंडा ल
गुरु.
पिहले पानी पी ल, तब पान खईह.’ यह परंपरा किसी दूसरे शहर में शायद ही
मिले. सब जगह अब लोग पानी खरीदकर पीते हैं. बनारसी फ्री में पानी पिलाते
हैं. प्यार से. जो एकदम अनजान होते हैं, अजनबी होते हैं, वे इस बनारसियों
के इस सहज स्वभाव को दूसरे रूप में ले लेते हैं. सोचते हैं कि अपनी
दुकानदारी चलाने के लिए यह अतिरिक्त सेवा दे रहा है. और इसी हिसाब से वे
व्यवहार भी करने लगते हैं. बनारसी रिएक्ट नहीं करते. अजनबी के व्यवहार पर
हंसते हैं.
12 मई को जब बहुचर्चित बनारस सीट पर सुबह से वोटिंग की शुरु आत हुई, तब
बनारसियों का वैसा ही स्वभाव दिखा. वे एक माह से अधिक समय से सबको
मान-सम्मान देकर उन्हें उम्मीदों से लबरेज करते रहे. सुबह से शाम तक
सहानुभूति भी दिखाते रहे, उत्साह भी बढ़ाते रहे और ऐसे प्यार से, दिल खोलकर
तारीफ करते रहे कि अजय राय, अरविंद केजरीवाल से लेकर दूसरे कई उम्मीदवारों
को भी भरोसा होता गया कि मोदी की लहर को वे रोक रहे हैं. दो दिनों पहले तक
बनारसी ऐसे ही फंसाये रखे सबको. अनुमान लगाना मुश्किल हो गया. अजय राय को
भी, केजरीवाल को भी और यहां तक कि मोदी को भी.
दो दिनों पहले एक ही दिन राहुल गांधी और अखिलेश यादव बनारस रोड शो करने
पहुंचे थे. पहले राहुल गुजरे. सड़क किनारे भीड़ थी. राहुल आगे बढ़ते गये,
भीड़ पीछे छुटती रही और फिर फटाफट पॉकेट से समाजवादी पार्टी का टोपी
निकालकर पहनती रही. इस बतकही के साथ कि गुरु राहुलवा भी देश के बड़का नेता
हौ, ओके स्वागत में भीड़ ना जुटित तो ई तो बनारस के बेइज्जती होखित ना. फिर
अखिलेश के स्वागत के पहले भी यही तर्क- गुरु आखिर जईसन भी हौ, हौ तो आपन
राज्य के मुख्यमंत्री ना, एक्के भी स्वागत करेके चाहीं, एके बुरा लागी, जब
भीड़ ना लागी.
राहुल और अखिलेश, दोनों भ्रम में पड़े होंगे भीड़ देखकर लेकिन उस भीड़
में ही इस तरह की बतकही करनेवाले बहुतेरे थे, जो बनारस की मान-मर्यादा का
ख्याल करते हुए दोनों नेताओं का तहे दिल से स्वागत किये और फिर शाम को
अस्सी तीरस्ता पर पप्पू की चाय दुकान से लेकर मैदागिन में शकील मियां की
अड़ी तक राष्ट्र, राष्ट्रवाद से गंगा, बनारस, देश और भी न जाने क्या-क्या
बात करते रहे. 12 मई को बनारस में भुलभुलैया का दौर खत्म हुआ.
हिंदू इलाके में भी. मुसलिम इलाके में भी. जो मोदी वाले थे, खुलकर मोदी
के साथ गये. जिन पर सपा, कांग्रेस की नजर थी, वे बहुतायत में केजरीवाल के
साथ हो गये. दोपहर तक मैसेज के जरिये मुसलमानों के पास यह संदेशा जाता रहा
कि अभी अभी मसजिदों से यह तय हुआ है कि वोट कांग्रेस को करना है. आम आदमी
पार्टी वाले कहते रहे कि यह भाजपाइयों की चाल है. मोदी केजरीवाल से हार रहे
हैं, इसलिए मुसलमानों का वोट कांग्रेस की ओर टर्न करवाकर भाजपाई अपनी जीत
किसी तरह पक्की करना चाहते हैं. आप वालों के इस तर्क में दम नहीं था.
मुसलमानों ने माना कि यह चाल भाजपा की बजाय कांग्रेस की है. मैसेज वाली चाल
किसकी थी, नहीं पता.
बनारस से कौन जीतेगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. लेकिन बनारस ने
इस बार उत्तर प्रदेश से लेकर देश की सियासत के समीकरण को गड़बड़ाने के
संकेत दिये हैं. कांग्रेस की परेशानी बढ़ेगी, क्योंकि बनारस के जरिये,
केजरीवाल के जरिये उनके परंपरागत मुसलिम मतों में सेंधमारी करने के लिए
मुलायम सिंह व सपा के बाद केजरीवाल जैसे तत्व भी पनप रहे हैं. मुलायम की
परेशानी भी बढ़ेगी, क्योंकि केजरीवाल उनके लिए भी कोई अच्छे संकेत देकर
नहीं जायेंगे बनारस से.
किसकी जीत होगी, किसकी हार होगी, यह 16 को पता चलेगा. मोदी की जीत होती
है तो यह कोई आश्चर्यजनक जीत नहीं होगी. केजरीवाल अगर हारते भी हैं और सच
में, जैसा कि माहौल दिखा, वे मुसलमानों का भारी मत प्राप्त कर बनारस से
लौटते हैं तो फिर वे एक नयी जीत लेकर ही जायेंगे. भाजपा को भयभीत करनेवाले
तत्व की तरह भी साबित होंगे, कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बनेंगे और सपा
की तरह राजनीति करनेवाली दूसरे क्षेत्रीय दलों की नींद हराम करनेवाले तत्व
भी बन जायेंगे.
फिलहाल चुनाव खत्म होने के बाद बनारस फिर से अतीत के खोल में समा गया
है. बनारसी अपने शहर से लाल बहादुर शास्त्री के बाद दूसरे प्रधानमंत्री
देने के लिए मोदी के हाई फाई और हाई प्रोफाइल लाव-लश्कर और चमचमाहट की
खुलेआम आलोचना करने के बावजूद मोदी के साथ भेड़ियाधसान चाल में जाते हुए
दिखे. बनारसी कह रहे हैं कि यह मोदी का तो करिश्मा था ही, एक पुरानी कसक भी
बनारसियों को उभर गयी. वही कसक कि इस शहर के ही शास्त्री जब पीएम बने थे
तो कांग्रेसियों ने, नेहरू-गांधी परिवार ने उन्हें भाव ही नहीं दिया था. अब
दूसरा प्रधानमंत्री देकर कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार से उस अपमान का
बदला लेंगे. बनारसी भाजपा को विजयी बनवायेंगे भी तो भाजपा को हरवाने का
गुमान पाले रखेंगे, क्योंकि बनारसियों को लगता है कि वे दिखावे के लिए
अरविंद केजरीवाल के पक्ष में इतने चले गये कि भाजपा ने बनारसियों से घबराकर
आखिरी में कह दिया कि प्रधानमंत्री बनारस का ही होगा.
(लेखक तहलका पत्रिका के विशेष संवाददाता हैं. यह आलेख उनके फेसबुक वाल से साभार.)
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बनारस से लोकसभा का चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से इस चुनाव के संदर्भ में बनारस सर्वाधिक चर्चित चुनाव क्षेत्र हो चुका है.
आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अरविन्द केजरीवाल के मोदी के ख़िलाफ़ खम ठोकने से यह क्षेत्र और भी चर्चा में आ गया है.
मंगलवार को कांग्रेस ने एक लंबे ऊहापोह, खोजबीन एवं इंतज़ार के बाद बनारस क्षेत्र के पिंडरा क्षेत्र से विधायक अजय राय को अपना उम्मीदवार घोषित किया है.
अजय राय बनारस क्षेत्र में काफ़ी लोकप्रिय हैं. यहां के लोगों के साथ उनका सुख-दुख का संबंध है.
पिछले लोकसभा के चुनाव में वह समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में यहां से चुनाव भी लड़ चुके हैं एवं एक लाख 23 हज़ार से ज़्यादा वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे. फिर भी यह कहना मुश्किल है कि वह मोदी के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन सकते हैं?
सामाजिक आधार
मीडिया विशेषकर टीवी चैनल एवं उनके सर्वेक्षण 'मोदीलहर' की घोषणा कर रहे हैं. किन्तु यहां के गांवों एवं शहरों में लोग इस लहर को मान तो रहे हैं पर इसे कोई शंका से, कोई संशय से देख रहा है. लहर अगर है भी तो उसे वोट में बदलने के लिए सामाजिक आधार की ज़रूरत होती है.
बनारस लोकसभा क्षेत्र के जातीय बनावट का अध्ययन करें तो अजय राय जिस जाति से जुड़े हैं वह भूमिहार जाति है जिसकी जनसंख्या बनारस में 90 हज़ार के आसपास है.
इस क्षेत्र में ब्राह्मण, पटेल, मुसलमान और वैश्य सभी जातियों की संख्या दो लाख से ऊपर है.
अगर जातीय स्थिति के आधार पर देखा जाए तो अजय राय को इसका बहुत फ़ायदा नहीं मिलता दिखता है. जातीय समीकरण के लिहाज से स्थिति भिन्न है.
अजय राय के कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलापति त्रिपाठी के परिवार से गहरे संबंध होने के कारण ब्राह्मण वोट कांग्रेस को भी मिल सकते हैं. वहीं मोदी विरोधी वोट के धुव्रीकरण की प्रक्रिया में मुसलमान वोटों की बड़ी भूमिका होगी.
बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से तक़रीबन 17,000 वोटों से पराजित हुए थे लेकिन इस बार उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला किया है.
मुख़्तार अंसारी के फ़ैसले से मुसलमान मतों के विभाजित होने का ख़तरा कम हुआ है. लगता है कि मुसलमान बड़े पैमाने पर कांग्रेस के साथ जा सकते लेकिन इसके लिए कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी.
दूसरी तरफ़ अगर केजरीवाल मेहनत कर पाए तो वे भी मुसलमान वोटों को प्रभावित कर सकते हैं.
पुरानी दुश्मनी
मुख्तार अंसारी एवं अजय राय की दुश्मनी इस क्षेत्र में काफ़ी प्रसिद्ध है. कांग्रेस मुख्तार अंसारी का असर कम करने की कोशिश कर रही थी ताकि मुस्लिम मत विभाजित न हो और कांग्रेस को एकमुश्त वोट मिल सके.
ऐसे में 'भूमिहार-ब्राह्मण-मुस्लिम गठजोड़' जिसे बनाने की कोशिश कांग्रेस के अजय राय कर रहे हैं, अगर वो बन जाता है तो वह मोदी को बड़ी चुनौती दे सकते हैं.
लेकिन इसमें एक पेंच है कि बनारस क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट के लिए कई ब्राह्मण प्रत्याशी उत्सुक थे जो टिकट न मिलने के कारण दुखी होंगे और इस बीएमबी (ब्राह्मण-मुस्लिम-भूमिहार) समीकरण बनाने में समस्या खड़ी कर सकते हैं.
इस क्षेत्र में दलित लगभग 80 हज़ार के आसपास हैं जिनका कुछ मत बीएसपी को और कुछ कांग्रेस को मिल सकता है.
इस क्षेत्र में पटेलों की भी बड़ी संख्या है, उनकी आबादी दो लाख के आसपास है जिसमें से ज़्यादातर सोने लाल पटेल की पार्टी 'अपना दल' के प्रभाव में हैं.
सोने लाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल ने भाजपा के साथ गठजोड़ किया गया है जिससे पटेल दुःखी तो हैं क्योंकि उनकी चाह थी कि अपना दल अलग से चुनाव लड़े. किन्तु इस गठबंधन का सम्मान रखते हुए वो वोट भाजपा को ही देते दिख रहे हैं.
जातियों की जोड़-तोड़
इस क्षेत्र में वैश्यों की संख्या लगभग दो लाख है और वे भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक माने जाते हैं. उनका एक बड़ा हिस्सा मोदी के पक्ष में संगठित होता दिखता है.
केजरीवाल वैश्य होने के बाद भी वैश्य मतों को कितना तोड़ पाते हैं, यह भविष्य में देखने वाली बात है. उम्मीद है कि शहरी मध्य वर्ग के वोटों में से केजरीवाल अच्छे ख़ासे वोट ले जाएंगे.
पटेल के अतिरिक्त लगभग 1.50 लाख मतदाताओं का संबंध अन्य ओबीसी जातियों से है. बनारस में यादवों की जनसंख्या तक़रीबन एक लाख है. समाजवादी पार्टी इन सामाजिक समूहों के मतों को लेने की कोशिश कर रही है.
लेकिन अजय राय के व्यक्तिगत संबंध जातियों से परे लोगों से वर्षो से बने हैं. इसीलिए उन्हें पिछडों और दलित जैसी उपेक्षित जातियों के वोट मिलने की आशा है.
अजय राय जोर-शोर से 'स्थानीय बनाम बाहरी' का मुद्दा इस चुनाव में उठाएंगे. पिछले दिनों हम लोगों ने इस क्षेत्र में फील्ड वर्क किया जिनमें देखने को मिला कि यहां के लोगों में स्थानीय उम्मीदवार की चाह महत्वपूर्ण है.
देखना यह है कि 'स्थानीय बनाम बाहरी' का मुद्दा राय को कितना फ़ायदा पहुंचाता है.
कम रहा मतदान, तो
अगर मतदान कम हुआ तो इसका असर बीजेपी की महत्तवकांक्षाओं पर पड़ेगा क्योंकि अब तक जो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण बीजेपी को 40 से 50 लोकसभा सीटें दे रहे थे, वो शायद ना मिल पाएं.
इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां मत प्रतिशत थोड़ा-बहुत बढ़ा भी है उसकी वजह मोदी के जोश ना होकर शायद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है.
अगर बीजेपी उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक सीटें लाना चाहती है तो उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी बढ़त हासिल करनी होगी. ऐसा ना होने की स्थिती में राज्य के बाक़ी हिस्सों में पार्टी की हालत पिछले चुनाव सरीखी ही रह सकती है.
इसका एक अर्थ ये भी है कि शायद 'लहर' वाली बात पूरी तरह सही नहीं है.
बद्री नारायण
समाजशास्त्री, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद
शुक्रवार, 11 अप्रैल, 2014 को 11:41 IST तक के समाचार
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर फिर हमला हुआ है. दिल्ली के दक्षिण पुरी इलाके में चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल की गर्दन पर एक युवक ने मुक्का मारा.
ये हमला काफी हद तक हरियाणा के चरखी दादरी की घटना जैसा था. चरखी दादरी में रोड शो के दौरान केजरीवाल को एक युवक ने गर्दन पर थप्पड़ मारा था. ताजा हमले में युवक ने जीप पर चढ़ कर केजरीवाल पर हमला किया.
हमले के बाद युवक को आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दबोच लिया और उसकी जमकर पिटाई की. इसके बाद उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया. हमलावर ने पुलिस पूछताछ के दौरान अपना नाम अब्दुल बैस्त बताया है. उसका कहना है कि वह आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता है और पार्टी की नीतियों से नाराज है.
हमले के बाद केजरीवाल ने आज तक से बातचीत की. उन्होंने कहा - 'मेरी गर्दन पर बहुत तेज मुक्का मारा, लेकिन कार्यकर्ताओं को उसे मारना नहीं चाहिए. वो लोग हमें मारेंगे ही उनका तो धर्म है मारना.'
तस्वीरों के साथ स्लाइडर में देखें-
पहाड़
दूर से ही सुन्दर दिखते है नजदीक जाओ तो सिर्फ पत्थर नजर आते है केजरीवाल
के वादे लुभावने थे| भ्रस्टाचार को भारत से कोई नेता नही मीटा सकता| अगर
जनता भ्रस्टाचार को मिटाने चाहेगी तो एक दिन मे मिटा सकती है| केजरीवाल को
सिर्फ बोलना आता है| करना नही| इसको धरना देना भी आता है
बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेन्द्र मोदी का वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ना
तय है. उस सीट के दावेदार मुरली मनोहर जोशी कानपुर से लड़ने को तैयार हो
गए हैं.एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने यह खबर दी है. पत्र के
मुताबिक उनका नाम शनिवार को जारी होने वाली सूची में नहीं होगा. मोदी इसके
अलावा अहमदाबाद पूर्व सीट से भी लड़ेंगे. गांधीनगर से लाल कृष्ण आडवाणी का
लड़ना भी तय माना जा रहा है.
पत्र ने यह भी लिखा है कि
अंतिम क्षणों में कुछ बदलाव भी हो सकते हैं. लेकिन फिलहाल यह तय दिख रहा है
कि मोदी उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ेंगे ही.
समझा जा रहा है
कि उत्तर प्रदेश की सीटों के बारे में शनिवार को कुछ खास बड़ी घोषणाएं
नहीं होंगी. यह भी संभव है कि बीजेपी अपने हेवीवेट नेताओं के नाम और उनकी
सीटों के बारे में अभी कुछ घोषित ना करे. उनके नाम 13 मार्च को ही घोषित
किए जाएंगे.
सूत्रों ने बाताया कि मोदी को उत्तर प्रदेश से
लड़ाने के पीछे पार्टी की मंशा वहां बीजेपी को और मजबूती प्रदान करना है.
वाराणसी की सीट बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में बहुत महत्वपूर्ण है. मोदी
के उत्तर प्रदेश से खड़े होने से पार्टी को जबर्दस्त सहारा मिलेगा. 80
सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश की अगली सरकार बनाने में बड़ी भूमिका होगी.
वहां मोदी के खड़े होने से पूर्वी उत्तर प्रदेश की 28 सीटों में पार्टी की
स्थिति मजबूत हो जाएगी.
आरएसएस अब पार्टी में धीरे-धीरे
ओल्ड गार्ड को किनारे लगाने में जुटा हुआ है. वह चाहता है कि पार्टी में नए
नेताओं की जगह बने. हालांकि बीजेपी के पुराने दिग्गज इसका विरोध कर रहे
हैं. फिर भी मोदी का वाराणसी सीट से खड़ा होना इसी कड़ी में माना जाएगा.

नई दिल्ली बीजेपी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए प्रधानमंत्री बनना इतना आसान नहीं होगा। उनकी अपनी पार्टी में भी उनकी राह में कांटे बिछाने वालों की कमी नहीं है। और वे कांटे बिछाने वाले ऐसे हैं कि मारपीट तक पर उतर सकते हैं। ऐसा ही कुछ वाराणसी में हुआ। बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी के समर्थकों ने नरेंद्र मोदी के समर्थकों से मारपीट की।
खबर है कि नरेंद्र मोदी के समर्थक वाराणसी शहर में लगे मुरली मनोहर जोशी के पोस्टर्स हटा रहे थे। इस बात पर जोशी के समर्थक भड़क गए और दोनों गुटों में मारपीट शुरू हो गई।
नरेंद्र मोदी की वाराणसी सीट से चुनाव लड़ने की संभावना है लेकिन बीजेपी के कद्दावर नेता मुरली मनोहर जोशी यह सीट छोड़ना नहीं चाहते। इसी हफ्ते शहर में उनके बड़े-बड़े पोस्टर्स लगाए गए हैं। इन पोस्टर्स और बैनर्स पर उनकी दावेदारी को मजबूत करते नारे लिखे हैं, मसलन - 'आतंकवाद पर लगे लगाम, डॉ. जोशी का पैगाम', बोले काशी विश्वनाथ, डॉ. जोशी का देंगे साथ।
पिछले दो महीनों में, जब से नरेंद्र मोदी की वाराणसी से चुनाव लड़ने की चर्चा शुरू हुई है, डॉ. जोशी ने वाराणसी की कई यात्राएं की हैं।
|
उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों पर मतदान का विवरण 1. 10 अप्रैल 2014 को: सहानपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़। 2. 17 अप्रैल 2014: नगीना, मुरादाबाद, रामपुर, सम्बल, अमरोहा, बदायुं, आओंला, बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी। 3. 24 अप्रैल 2014: हाथरस, मथुरा, आगरा, फतेहपुर सीकरी, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, कन्नौज, अकबरपुर।
4. 30 अप्रैल 2014 द्वारहाट, सीतापुर, मिश्रिख, उन्नाव, मोहनलालगंज,
लखनऊ, रायबरेली, कानपुर, जालौन, झांसी, हमीरपुर, बांदा, फतेहपुर, बाराबंकी।
5. 7 मई 2014 अमेठी, सुलतानपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, फूलपुर,
इलाहाबाद, फैजाबाद, अंबेडकरनगर, बहराइच, कैसरगंज, श्रावस्ती, गोंडा, बस्ती,
संतकबीर नगर, भदोही। 6. 12 मई 2014 डुमरियागंज, महाराजगंज, गोरखपुर,
कुशीनगर, देवरिया, बंसगांव, लालगंज, आजमगढ़, घोसी, सलेमपुर, बलिया, जौनपुर,
मछलीशहर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, मिर्जापुर, रॉबर्ट्सगंज। उपचुनाव की डेट 30 अप्रैल को- उन्नाव, फतेहपुर में और 7 मई को रामपुरखास और विश्वनाथ गंज में
चुनाव आयोग ने बुधवार को लोकसभा चुनाव से जुड़े अहम तारीखों का ऐलान कर
दिया है. नौ चरणों में 543 लोकसभा सीटों और सिक्किम, आंध्र प्रदेश, ओडिशा
में चुनाव होंगे. आखिरी नवां चरण 12 मई तीन राज्य 41 संसदीय क्षेत्र, दो
बाई इलेक्शन, दो स्टेट असेंबली, जब वहां लोकसभा के चुनाव होंगे तभी. 16 मई
को मिलेगी नई सरकार. कब कहां होंगे चुनाव, सभी राज्यों की लिस्ट
|
|
|
बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
|
|
|