बनारस
के अलावा अन्य जगह पाना खाया जाता है, लेकिन बनारसी पान खाते नहीं, घुलाते
हैं। पान घुलाना साधारण क्रिया नहीं हैं। पान का घुलाना एक प्रकार से
यौगिक क्रिया है। यह क्रिया केवल असली बनारसियों द्वारा ही सम्पन्न होती
है। पान मुँह में रखकर लार को इकट्ठा किया जाता है और यही लार जब तक मुँह
में भरी रहती है, पान घुलता है। कुछ लोग उसे नाश्ते की तरह चबा जाते हैं,
जो पान घुलाने की श्रेणी में नहीं आता।
पान की पहली पीक फेंक दी जाती है ताकि सुर्ती की निकोटिन निकल जाए। इसके
बाद घुलाने की क्रिया शुरू होती है। अगर आप किसी बनारसी का मुँह फूला हुआ
देख लें तो समझ जाइए कि वह इस समय पान घुला रहा है। पान घुलाते समय वह बात
करना पसन्द नहीं करता। अगर बात करना जरूरी हो जाए तो आसमान की ओर मुँह करके
आपसे बात करेगा ताकि पान का, जो चौचक जम गया होता है, मज़ा किरकिरा न हो
जाए।
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बनारस और उसके स्वाद
Labels: बनारसी खान पान
स्वाद की बात हो और बनारस का जिक्र ना आए ! ये हो सकता हैं भला, चलिए बनारस और उसके स्वादों से आपकी मुलाकात करा देते हैं |
यहाँ स्वाद हैं, रास्तो का, गलियों का, गंगा का
घाट का भी और चाट का भी,
यहाँ स्वाद हैं, रास्तो का, गलियों का, गंगा का
घाट का भी और चाट का भी,
कुल मिला के बनारस स्वादों से भरपूर हैं |
शुरू कहा से करे,
बनारस हिंदू युनिवर्सिटी के मेन गेट से करते हैं, आखिर यहाँ दो चीजे आपको 24 घंटे मिलेगी
चाय और बन मलाई, सुनने में कुछ खास नहीं लगती,
पर युनिवर्सिटी के स्टुडेंट्स के लिए अमृत से कम नहीं हैं, खास कर देर रात को जब कुछ नहीं मिलता |
अब थोड़ा आगे बढते हैं, अस्सी घाट स्टुडेंट्स का अड्डा हैं
हर शाम यहाँ आपको भीड़ मिलेगी, भौकाल चाट वाले की खूब डिमांड है यहाँ |
चलिए आपको कचौरी गली ले चलते हैं, सुबह आठ से दस बस यही वक्त है इसका, लेट हो गए तो कुछ नहीं मिलेगा | गिनती की तीन दुकाने हैं, पर जो स्वाद आपको यहाँ मिलेगा कही न मिलेगा और इनकी जलेबी का तो क्या कहना |
घड़ी बता रही हैं की दस से उपर हो चला हैं, चलिए केदार घाट चलते हैं |
बस केदार घाट के उपर ही है ये दुकान, श्री राम स्वीट्स
गजब का गजक बनाते हैं, काजू गजक खाने के लिए, कम से कम आपको दो किलोमीटर चलना पडेगा, चाहें घाट के रास्ते या गली के रास्ते, आप ना चल पायेंगे कहिये तो हम ले आए हर दूसरे तीसरे दिन पहुच जाते हैं |
अब कहा चला याए, लस्सी पीजियेगा
कौन सी, हाँ जी कौन सी !
रविदास गेट की पहलवान लस्सी’
या रामनगर की रबड़ी दार लस्सी,
या वो जो विदेशीयों को खूब भाती हैं, Blue लस्सी,
सही सुना आपने ! Blueberry लस्सी, Apple banana chocolate लस्सी, या Pinapple लस्सी,
सही सुना आपने नाम लेते जाई पचासों तरह की लस्सी बनाते हैं ये |
काफी भीड़ होती हैं यहाँ, आपको खड़ा हो के पीना पड़ सकता हैं सड़क पे, हाँ मगर Free WiFi देता हैं ये |
ठंडाई तो हम भूल ही गए, वैसे तो कई दुकाने हैं गदौलिया चौराहे पे,
पर मेरी खास चर्च के पीछे हैं, रंगीन पीजियेगा या सादी
नहीं समझे भोलेनाथ का प्रसाद भांग लेंगे या नहीं,
नहीं, चलिए कोई बात नहीं |
मीठा बहोत हो गया ना,
चलिए चाट हाँ मशहूर बनारसी चाट खिलाए,
काशी चाट भंडार, दीना चाट भण्डार और केशरी चाट भण्डार |
मै दीना चाट भंडार पे खाना पसंद करता हूँ, नारियल बाजार में हैं ये चौक पुलिस स्टेसन के पीछे, क्या खाइएगा फुलकी(पानी पूरी), टमाटर चाट या दही बड़े |
अब चलिए ले चलता हूँ आपको जन्नत में, घबराई नहीं जान नहीं देनी होगी
ठठेरी बजार चलाना होगा बस, मेरे लिए यह जगह जन्नत से कम नहीं, जन्नत इसलिए की यहाँ जो चीज खाइए एक से बढकर एक, अमृत भी कह सकते हैं, ये गली स्वादों से भरी हैं |
सुबह लाया होता तो आपको, The राम भंडार प्रसिद्ध छोटी कचौरी, पूरी कचौरी खिलाया होता मजा आ जाता, इस वक्त आपको समोसा छोला मिल जाएगा |
चिंता ना करे अभी भी कोई कम आनंद नहीं आने वाला, वो दिख रहा हैं आपको जो सफ़ेद मकान से सटा के टेबल पे कुछ बेच रहा हैं, जानते वो मकान किसका हैं ! भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी का हिंदी के बहुत बड़े कवि थे, उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह भी कहा जाता हैं |
अब आइए इस दूकान पे, पलंग तोड़ रबडी कभी खाई हैं, Sandwich रबड़ी भी कहते है इसे, ये खाने के बाद कुछ अच्छा नहीं लगेगा, ये आखिर में खाएँगे |
थोड़ा आगे एक खास दुकान हैं, “श्री लक्ष्मी गोरस भंडार” दो तीन चीज़े ही बनाते हैं ये,
और रात नौ बजते बजते सब खतम भी हो जाती हैं |
मालई पूरी खाई है कभी, अरे मलाई पूरी से ही पेट भरेंगे क्या !
इनकी रबड़ी का जवाब नहीं हैं वो कौन खायेगा ?
इस राबड़ी के लिए हम जान दे भी सकते हैं और ले भी सकते हैं |
कलाकंद भी हैं खा लिजिये ये स्वाद कही और ना मिलेगा |
ठंडी में आए होते तो मलइयो भी खिलाते आपको, ठंडी में ही मिलती हैं वो बस |
कहाँ कहाँ चल दिए जनाब ! एक स्वाद तो आप भूल ही गए,
बनारसी स्वाद अधूरा हैं इसके बिना
बनारसी पान कौन खायेगा ?आत्मा तृप्त न हो जाए तो बोलिए, चलिए मुह खोलिए |
चलिए अब चलते हैं, अब अगली बार मिलेंगे, किसी और शहर की गलियां, नुक्कड़ चौराहे छानेंगे |
Post Link : शशिप्रकाश सैनी
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बनारसी बाटी-चोखा
Labels: बनारसी खान पान
आज हमारे बनारस में इतनी ठण्ड पड़ रही है कि जो लोग हमेशा "अकड़" कर चलते थे वो भी "सिकुड़" कर चल रहे हैं॥
मजे कि बात तो ये है कि आज तो पप्पू "सुडिया", उस्मान "बेनिया", गुड्डू "बंगाली", सोनू "अस्सी", डब्लू "डीरेका" सब बड़े बड़े गुरु लोग जाड़ा में कुड़कुडा रहे हैं
गुरु ठंडी त आज जुलुम का है .. पेश है आप सभी के लिए बनारसी बाटी-चोखा और घी वाली दाल।चापा गुरु.. और रजाई में निबुक जाइये
POST LINK For "बनारसी मस्ती के बनारस"
मजे कि बात तो ये है कि आज तो पप्पू "सुडिया", उस्मान "बेनिया", गुड्डू "बंगाली", सोनू "अस्सी", डब्लू "डीरेका" सब बड़े बड़े गुरु लोग जाड़ा में कुड़कुडा रहे हैं
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मटर की पूड़ी
Labels: बनारसी खान पान
बनारसी मस्ती के सभी मित्रो को आज नाश्ते में मटर की पूड़ी,
संगीता खन्ना जी कि तरफ से
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संगीता खन्ना जी कि तरफ से
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शिव नगरी काशी के तीन प्रसिद्ध तीर्थ हैं - काशी विश्वनाथ (ज्योतिर्लिंग) मन्दिर, काल-भैरवजी का मन्दिर और गंगा तट - मुख्यतः पञ्चगंगा से अस्सी घाट तक। यह विश्वनाथ क्षेत्र ही वाराणसी का हृदय प्रदेश है। अन्नपूर्णा सहित विश्वनाथ की परिक्रमा में रचा-बसा यह शताब्दियों से ऐसा ही है। हाँ एक बहुत बड़ा परिवर्तन कभी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यहाँ एक मस्जिद भी है - विश्वनाथ मन्दिर के ठीक पीछे उतर की ओर लगे हाथ। कहते यह हैं कि मुगल सैनिकों ने पूर्व-स्थापित विश्वनाथ मन्दिर को तोड़कर उसकी जगह मस्जिद बना दिया। भूतभावन विश्वनाथ पास के कुएँ में कूद गए। वहीं से लाकर उन्हें अहल्या बाई होलकर द्वारा बनवाए गए आज के स्वर्ण मन्दिर में प्रतिष्ठित किया गया। विश्वनाथ मन्दिर के बाद चलें इस शहर के कोतवाल काल भैरव के मन्दिर की ओर। इसे मात्र संयोग ही नहीं मानना चाहिए कि उनका मन्दिर वर्तमान कोतवाली से कुछ दूर पर ही है। मुझे याद है मेरी माँ बचपन में हमेशा भैरवजी का दर्शन कराकर डंडे लगवाती थी। पंडों को दक्षिणा देती थी। एकाध बार मेरे बालों की कटाई भी हुई है यहाँ। पहले बकरों की बलि भी लेते थे भैरव बाबा। अब तो संभवतः लोगों की बुद्धि पर तरस खाते हए उन्होंने ऐसी बलि लेनी बन्द कर दी है। फिर भी आप जाइए और सुबह से शाम तक अगर बाबा के मन्दिर पर धरना दीजिए तो आपका दूसरा लोक तो उनके आशीष से संवर ही जाएगा, इस लोक के लंद-फंद से जूझने की ताकत भी मिलेगी।
काशी सेवन का एक दूसरा अंदाज भी है। यह बनारस का चौथा सत्य है-
चना, चबेना गंग जल जो पुरवै करतार।
कासी कभी न छोड़िए विश्वनाथ दरबार।।
मैं इसका एक दूसरा ही संसकरण प्रस्तुत करना चाहूँगा -
चना भंग गंगा-जल पाना।
विश्वनाथपुर छोड़ न आना।
अगर भगवान विश्वनाथ की कृपा से चना, भांग, गंगा-जल और पान मिलता रहे तो बनारस छोड़ कहीं और जाने का जोखिम कोई क्यों उठाए। यही एक शहर है जहाँ अकेला चना भी भाड़ झोंकने की अहमियत रखता है। रही भोजन के लिए चना ही काफी है की बात - तो इस पर बहस की गुंजाइश हो सकती है। जिसकी गांठ में नामा हो वह चने की कीमत नहीं आंक सकता। जिसका गरूर यह हो कि वह चने खाकर भी ताल ठोकता हुआ काशी में ही रहने का जोखिम उठाएगा ऐसा ही आदमी चना खाकर अकेले भाड़ झोंकने की हिमाकत कर सकता है। यहीं भांग के बारे में भी कुछ कहना जरूरी हो जाता है। अगर नहीं तो इस तरह यह सारी दुनियाँ पर क्यों हावी हो जाता। बनारस मस्त शहर है और इस म्स्ती के लिए भांग एक निहायत जरूरी चीज है। सुनते हैं कि जापानी लोग चाय-पान के पहले चाय-संस्कार करते हैं। भांग पीने या गोला निगलने के पहले उसका संस्कार जरूरी हो जाता है। पहले गंगा के किनारे या गंगा पर तिरती हुई नावों में सिलबटे पर भांग पीसने का रियाज हुआ करता था। यही रियाज इस संस्कारी शहर का भंग संस्कार पर्व बन गया था। एक ऐसा पर्व जो साल के हर दिन मनाया जाता था। संस्कृत भांग विजया की संज्ञा पाकर संस्कर्ता के लिए विजया-पर्व बन जाता था। एक ऐसा पर्व जिसका धर्म मस्ती से अलग और कुछ हो ही नहीं सकता। आज यह भंग-पर्व महा-शिवरात्रि और होली के दो विशेष दिनों तक ही सीमित होकर रह गया है। होली का भंग-पर्व बहुत हद तक आधुनिक सुरा पर्व बन गया है। बुढवा-मंगल, यानी गए साल के आखिरी मंगल की रात, गंगा के वक्ष पर बजरों पर खनकती घुंघरुओं की आवाज पर रूपाजीवाओं की थिरकन, भंग की तरंग में बहकते रईसों की आन-बान अब याददाश्त की बात भर रह गई है। बनारस की रईसी मर चुकी है, ठीक वैसे ही जैसे यहाँ की गुण्डा संस्कृति। महाराज बनारस श्री चेत सिंह के जमाने तक वाराणसी की गुण्डा-संस्कृति सदाबहार रही। वारेन हेस्टिंगज़ को इसी संस्कृति ने धूल चटाई। तब गुंडा शब्द का अर्थ ही अलग हुआ करता था।
हाँ, भांग घोटने और ठंडई छानने की बात घरों से उठ कर मैदागिन के बाबा ठंडाई । अब आपको छानना
हो तो मैदागिन के बाबा ठंडई जाइए, उससे आगे जा सकें तो बांस-फाटक की ढाल पर कन्हैया चित्र-मन्दिर से आगे बाईं ओर गली में जाइए। मेरी दृष्टि में छान-पर्व का दिव्य तीर्थ यही है। भांग-ठंडाई के साथ, खासतौर पर बनारसी (मगही) पान का योग मणि-काञ्चन योग की तरह ही मान्य होना चाहिए। पान की महिमा आयुर्वेद से लेकर संस्कृत काव्यों तक सर्वत्र चर्चित है। पान फेरा जाता है, कत्था जमाया जाता है, और चूना लगाया जाता है। यही फेरने, जमाने और लगाने की लयात्मक प्रक्रिया मगही पान के पत्तों पर उतर कर रसानुभूति बन जाती है। इस रसानुभूति का सद्यः उद्रेक जर्दे के बिना कुछ विशेष रियाज से ही संभव है। यही पान है जिसके दो बीड़े महाराज श्री हर्ष के कर कमलों से पाकर अतीत का कवि जीवन का सर्वस्व प्राप्त कर लेता था। अब तो केशव का पान बनारस की शान बना लंका तिराहे पर धूनी रमा कर बैठ गया है।
बनारस का अपना खानपान है। उत्तर भारत के प्रसिद्ध व्यंजनों के साथ ही यहां देश-दुनिया के प्रसिद्ध खाने सुलभ हैं। वैसे बनारस की खासियत है यहां की लस्सी और दूध। सुबह के समय कचौरी और जलेबी खाएं और दोपहर में सादा खाना। शाम को लौंगलता के साथ समोसा और गुलाब जामुन ले सकते हैं। इसके बाद बनारस की प्रसिद्ध ठंडई पीना और पान खाना न भूलें।
हा तो मै बात कर रहा था मैदागिन के बाबा ठंडई की, दुकान तो शायद १६-१७ साल पुरानी है, हा पर उस
समय से देख रहा हु , जब काशी में भांग ठंडाई, बड़े लोगो का शौख होता था, उस ज़माने में पैसा जूता कर ठंडाई पिने जाता था, उम्र बहुत छोटी थे , डर से भांग मागता था
"संध्या समय छनै ठंडाई, हो शरबत का पान|| तरी भरी है तरबूजों में , खूब उड़ाओ , आम || अजी न लगते खरबूजों के, लेने में कुछ ... लगती थी अति ऊब || बजा रहे चिमटा बाबा जी , करते सीता राम || पहन लंगोटा पड़े हुए हैं , कम्बल का क्या काम "
आज भी उस दुकान को देखता हु तो अपना बचपन याद आ जाता है.. वैसे तो काशी में गाँजा और भाँग के सेवन के साथ कई नियमों का चलन है । निपटना , नहाना , रियाज और गीजा - पानी ग्रहण करना इनमें प्रमुख हैं । इनाके पालन में व्यतिक्रम हुआ तब ही शिव के इन प्रसाद से नुक़सान होता है यह मान्यता है । मलाई , रबड़ी जैसे गरिष्ट - पौष्टिक तत्व गीजा कहलाते हैं । यह धारणा प्रचलित है कि गीजा तत्वों को ग्रहण कर लेने से गाँजा- भाँग के नुकसानदेह प्रभाव खत्म हो जाते हैं और सकारात्मक प्रभाव शेष रह जाते हैं । बहरहाल , दरजा नौ की होली में इन नियमों को ताक पर रख कर मैंने एक प्रयोग किया । उन दिनों दस पैसे में चार गोलगप्पे ( पानी पूरी, बताशा या पुचका ) मिला करते थे । भाँग की सोलह गोलियाँ , सोलह गोलगप्पों में डालकर ग्रहण कर गए । कुछ दिनों तक संख्या कुछ घटा कर क्रम चलता रहा । यूँ तो काशी में विजया कई रूपों में उपलब्ध है - ठण्डई , कुल्फ़ी , नानखटाई और माजोम या मुनक्का के अलावा सरकारी ठेके पर पिसी-पिसाई गोली । इस प्रयोग का परिणाम मुझे करीब तीन महीने भुगतना पड़ा । अब काशी जाते ही पहले मृतुन्जय महादेव, फिर कल भरो दर्शन के बाद गौरी की कचौड़ी फॉर दूसरा काम, इतजार रहता है गोधुली बेला का फिर मैदागिन के जैन धर्मशाला के सामने बाबा ठंडई, २ गोला बाबा के प्रसाद के बाब १ बड़का पुरवा ठंडई, लगता है स्वर्ग का अहसास ..
बाब बम अलख ! खोल दा पलक ! दिखा दा दुनिया के झलक ! ' , 'बमबम ,लगे दम,मिटे गम,खुशी रहे - हरदम ' , ' बम चण्डी ,फूँक दे दालमण्डी , ना रहे कोठा , ना नाचे रण्डी
Baba Thandai
St Kabir Rd
Maidagin Crossing, Maidagin, Bisweshwarganj
Varanasi, Uttar Pradesh 221001
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