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काशी विश्‍वनाथ मंदिर

काशी विश्‍वनाथ मंदिर मूल काशी विश्‍वनाथ मंदिर बहुत छोटा था। 18वीं शताब्‍दी में इंदौरा की रानी अहिल्‍याबाई होल्‍कर ने इसे भव्‍य रूप प्रदान किया। सिख राजा रंजीत सिंह ने 1835 ई. में इस मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था। इस कारण इस मंदिर का एक अन्‍य नाम गोल्‍डेन टेम्‍पल भी पड़ा। यह मंदिर कई बार ध्‍वस्‍त हुआ। वर्तमान में जो मंदिर है उसका निर्माण चौथी बार में हुआ है। कुतुबुद्दीन ऐबक ने सर्वप्रथम इसे 1194 ई. में ध्‍वस्‍त किया था। रजिया सुल्‍तान (1236-1240) ने इसके ध्‍वंसावशेष पर रजिया मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसके बाद इस मंदिर का निर्माण अभिमुक्‍तेश्‍वर मंदिर के नज़दीक बनवाया गया। बाद में इस मंदिर को जौनपुर के शर्की राजाओं ने तोड़वा दिया। 1490 ई. में इस मंदिर को सिंकदर लोदी ने ध्‍वंस करवाया था। 1585 ई. में बनारस के एक प्रसिद्ध व्‍यापारी टोडरमल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 1669 ई. में इस मंदिर को औरंगजेब ने पुन: तोड़वा दिया। औरंगजेब ने भी इस मंदिर के ध्‍वंसावशेष पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था।
मूल मंदिर में स्थित नंदी बैल की मूर्त्ति का एक टुकड़ा अभी भी जाना वापी मस्जिद में दिखता है। इसी मस्जिद के समीप एक जाना वापी कुंआ भी है। विश्‍वास किया जाता है कि प्राचीन काल में इसे कुएं से अभिमुक्‍तेश्‍वर मंदिर में पानी की आपूर्ति होती थी। 1669 ई. में जब काशी विश्‍वनाथ के मंदिर को औरंगजेब द्वारा तोड़ा जा रहा था तब इस मंदिर में स्‍थापित विश्‍वनाथ की मूर्त्ति को इसी कुएं में छिपा दिया गया था। जब वर्तमान काशी विश्‍वनाथ का निर्माण हुआ तब इस कुंए से मूर्त्ति को निकाल कर पुन: मंदिर में स्‍थापित किया गया। इस मंदिर परिसर में कई अन्‍य छोटे-छोटे मंदिर भी हैं। ये मंदिर विष्‍णु, अभिमुक्‍ता विनायक, दण्‍डपाणिश्‍वर, काल भैरव तथा विरुपक्ष गौरी का मंदिर है। दश्‍वमेद्यघाट से यह मंदिर आधे किलोमीटर की दूरी पर है।  

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ये भी देखे. काशी के शिवालय

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एक संक्षिप्त इतिहास
भारत की पवित्र नदी गंगा के पश्चिमी तट पर स्थायी, वाराणसी विश्व का सबसे पुराना जीवित शहर और भारत की सांस्कृतिक राजधानी है. यह इस शहर के दिल में है कि वहाँ अपनी पूरी महिमा काशी विश्वनाथ मंदिर में जो निहित है शिव Vishweshwara, या विश्वनाथ के ज्योतिर्लिंग में खड़ा है. यहाँ भारत के लाखों लोगों को केंद्र की ओर झुकना जो माया के बंधन और निष्ठुर दुनिया की उलझनों से मुक्ति प्रदान इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके आशीर्वाद और आध्यात्मिक शांति की तलाश है. ज्योतिर्लिंग की Asri काशी विश्व नाथ मंदिर सरल झलक आत्मा सफाई अनुभव है कि जीवन को बदल देती है और यह ज्ञान और भक्ति के मार्ग पर डालता है. Vishweshwara ज्योतिर्लिंग भारत के आध्यात्मिक इतिहास में एक बहुत विशेष और अद्वितीय महत्व है. परंपरा यह है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए एक एकल यात्रा से भारत के विभिन्न भागों में बिखरे अन्य ज्योतिर्लिंग के दर्शन से अर्जित गुण भक्त के लिए जमा. गहरा और परिचित हिंदू मन में प्रत्यारोपित, काशी विश्वनाथ मंदिर हमारे कालातीत सांस्कृतिक परंपराओं और उच्चतम आध्यात्मिक मूल्यों के रहने वाले embodinent  किया गया है. मंदिर सभी महान संतों, आदि शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, गोस्वामी तुलसीदास, महर्षि दयानंद सरस्वती, Gurunanak और कई अन्य आध्यात्मिक व्यक्तित्व का दौरा किया है. काशी विश्वनाथ मंदिर के रूप में अच्छी तरह से न केवल भारत बल्कि विदेशों आगंतुकों को आकर्षित करती है और इस तरह आदमी के लिए एक दूसरे के साथ शांति snd सद्भाव में जीने की इच्छा का प्रतीक है. इस आध्यात्मिक सत्य के एक सर्वोच्च भंडार किया जा रहा विश्वनाथ इस प्रकार विश्व बंधुत्व और राष्ट्रीय पर सहानुभूति के रूप में के रूप में अच्छी तरह से वैश्विक स्तर के बंधन को मजबूत है. 28 जनवरी, 1983 को मंदिर पर सरकार द्वारा लिया गया था. उत्तर प्रदेश और यह प्रबंधन के बाद से कभी डॉ. विभूति नारायण सिंह के साथ एक ट्रस्ट को सौंपा खड़ा है. पूर्व अध्यक्ष के रूप में संभागीय आयुक्त के साथ एक कार्यकारी समिति के अध्यक्ष के रूप में काशी नरेश,. वर्तमान आकार में मंदिर बनाया गया था वापस 1780 में स्वर्गीय महारानी इंदौर के अहिल्या बाई होलकर के द्वारा. 1785 वर्ष में एक Naubatkhana मंदिर के सामने तो मो कलेक्टर द्वारा बनाया गया था. इब्राहिम खान गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के उदाहरण में. 1839 में, मंदिर के दो गुंबदों पंजाब केसरी महाराजा रंजीत सिंह द्वारा दान सोने से कवर किया गया. तीसरा गुंबद लेकिन रह गया खुला, संस्कृतियों और धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश की सरकार मंदिर के तीसरे गुंबद के चढ़ाना सोने के लिए गहरी रुचि ले लिया.

 
अनुष्ठान मंदिर 2:30 पर दैनिक खोलता है मंगला आरती में 3 से 4 टिकट धारकों में शामिल होने की अनुमति दी जाती है. 4 से 11 बजे सामान्य दर्शन की अनुमति दी है. 11,30 से 12 बजे के मध्य दिन भोग आरती किया जाता है. फिर 12 से दोपहर 7 बजे भक्तों के दर्शन के लिए स्वतंत्र हैं. 7 करने के लिए 8,30 बजे शाम सप्त ऋषि आरती किया जाता है जिसके बाद दर्शन फिर संभव uptill 9 बजे जब श्रृंगार / भोग आरती शुरू होता है. बाहर की ओर से 9 बजे दर्शन के बाद ही संभव है. Shayana आरती 10.30pmThe मंदिर में शुरू होता है 11:00 में बंद प्रसाद के अधिकांश, दूध, कपड़े, और अन्य ऐसी प्रसाद poors के लिए दिया जाता है. या विकास या विशिष्ट उद्देश्यों की दिशा में नकद तरह में योगदान की वजह से विचार देने स्वीकार किए जाते हैं और उसके एक रसीद जारी है और दान वांछित सेवा के लिए प्रयोग किया जाता है. भक्तों पुस्तक काउंटर पर शिकायत / सुझाव / शिकायत सुझाव, यदि कोई हो, रिकॉर्ड करने के लिए अनुरोध कर रहे हैं. त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता के मामले सीधे मुख्य कार्यकारी अधिकारी के नोटिस में लाया जा सकता है. नाम "श्री काशी विश्वनाथ मंदिर फंड में सभी दान चैक / ड्राफ्ट तैयार हो और नीचे दिए गए पते पर भेजा:

मुख्य कार्यकारी अधिकारी

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

विश्वनाथ गली, वाराणसी - 221,001



आप भी घर बैठे वाराणसी स्‍थित पवित्र ज्‍योतिर्लिंग के दर्शन कर सकते हैं। यह व्‍यवस्‍था श्री काशी विश्‍वनाथ मंदिर ट्रस्‍ट की तरफ से की गई है। बस  ऑन लाइन  दर्शन के लिए यहाँ क्लीक करे  और करें भूत भावन भगवान भोले भंडारी के लाइव दर्शन।


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श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद के काशी नगर में अवस्थित है। कहते हैं, काशी तीनों लोकों में न्यारी नगरी है, जो भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजती है। इसे आनन्दवन, आनन्दकानन, अविमुक्त क्षेत्र तथा काशी आदि अनेक नामों से स्मरण किया गया है। काशी साक्षात सर्वतीर्थमयी, सर्वसन्तापहरिणी तथा मुक्तिदायिनी नगरी है। निराकर महेश्वर ही यहाँ भोलानाथ श्री विश्वनाथ के रूप में साक्षात अवस्थित हैं। इस काशी क्षेत्र में स्थित

    श्री दशाश्वमेध
    श्री लोलार्क
    श्री बिन्दुमाधव
    श्री केशव और
    श्री मणिकर्णिक

ये पाँच प्रमुख तीर्थ हैं, जिनके कारण इसे ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा जाता है। काशी के उत्तर में ओंकारखण्ड, दक्षिण में केदारखण्ड और मध्य में विश्वेश्वरखण्ड में ही बाबा विश्वनाथ का प्रसिद्ध है। ऐसा सुना जाता है कि मन्दिर की पुन: स्थापना आदि जगत गुरु शंकरचार्य जी ने अपने हाथों से की थी। श्री विश्वनाथ मन्दिर को मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने नष्ट करके उस स्थान पर मस्जिद बनवा दी थी, जो आज भी विद्यमान है। इस मस्जिद के परिसर को ही 'ज्ञानवाणी' कहा जाता है। प्राचीन शिवलिंग आज भी 'ज्ञानवापी' कहा जाता है। आगे चलकर भगवान शिव की परम भक्त महारानी अहल्याबाई ने ज्ञानवापी से कुछ हटकर श्री विश्वनाथ के एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण कराया था। महाराजा रणजीत सिंह जी ने इस मन्दिर पर स्वर्ण कलश (सोने का शिखर) चढ़वाया था। काशी में अनेक विशिष्ट तीर्थ हैं, जिनके विषय में लिखा है–
विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम्।
वन्दे काशीं गुहां गंगा भवानीं मणिकर्णिकाम्।।

अर्थात ‘विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग बिन्दुमाधव, ढुण्ढिराज गणेश, दण्डपाणि कालभैरव, गुहा गंगा (उत्तरवाहिनी गंगा), माता अन्नपूर्णा तथा मणिकर्णिक आदि मुख्य तीर्थ हैं।

काशी क्षेत्र में मरने वाले किसी भी प्राणी को निश्चित ही मुक्ति प्राप्त होती है। जब कोई मर रहा होता है, उस समय भगवान श्री विश्वनाथ उसके कानों में तारक मन्त्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन के चक्कर से छूट जाता है, अर्थात इस संसार से मुक्त हो जाता है।

काशी नगरी की उत्पत्ति
काशी नगरी की उत्पत्ति तथा उसकी भगवान शिव की प्रियतमा बनने की कथा स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में वर्णित है। काशी उत्पत्ति के विषय में अगस्त्य जी ने श्रीस्कन्द से पूछा था, जिसका उत्तर देते हुए श्री स्कन्द ने उन्हें बताया कि इस प्रश्न का उत्तर हमारे पिता महादेव जी ने माता पार्वती जी को दिया था। उन्होंने कहा था कि ‘महाप्रलय के समय जगत के सम्पूर्ण प्राणी नष्ट हो चुके थे, सर्वत्र घोर अन्धकार छाया हुआ था। उस समय 'सत्' स्वरूप ब्रह्म के अतिरिक्त सूर्य, नक्षत्र, ग्रह,तारे आदि कुछ भी नहीं थे। केवल एक ब्रह्म का अस्तित्त्व था, जिसे शास्त्रों में ‘एकमेवाद्वितीयम्’ कहा गया है। ‘ब्रह्म’ का ना तो कोई नाम है और न रूप, इसलिए वह मन, वाणी आदि इन्द्रियों का विषय नहीं बनता है। वह तो सत्य है, ज्ञानमय है, अनन्त है, आनन्दस्वरूप और परम प्रकाशमान है। वह निर्विकार, निराकार, निर्गुण, निर्विकल्प तथा सर्वव्यापी, माया से परे तथा उपद्रव से रहित परमात्मा कल्प के अन्त में अकेला ही था।


कल्प के आदि में उस परमात्मा के मन में ऐसा संकल्प उठा कि ‘मैं एक से दो हो जाऊँ’। यद्यपि वह निराकार है, किन्तु अपनी लीला शक्ति का विस्तार करने के उद्देश्य से उसने साकार रूप धारण कर लिया। परमेश्वर के संकल्प से प्रकट हुई वह ऐश्वर्य गुणों से भरपूर, सर्वज्ञानमयी, सर्वस्वरूप द्वितीय मूर्ति सबके लिए वन्दनीय थी। महादेव ने पार्वती जी से कहा– ‘प्रिये! निराकार परब्रह्म की वह द्वितीय मूर्ति मैं ही हूँ।

सभी शास्त्र और विद्वान मुझे ही ‘ईश्वर ’ कहते हैं। साकार रूप में प्रकट होने पर भी मैं अकेला ही अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता हूँ। मैंने ही अपने शरीर से कभी अलग न होने वाली 'तुम' प्रकृति को प्रकट किया है। तुम ही गुणवती माया और प्रधान प्रकृति हो। तुम प्रकृति को ही बुद्धि तत्त्व को जन्म देने वाली तथा विकार रहित कहा जाता है। काल स्वरूप आदि पुरुष मैंने ही एक साथ तुम शक्ति को और इस काशी क्षेत्र को प्रकट किया है।’

प्रकृति और ईश्वर
इस प्रकार उस शक्ति को ही प्रकृति और ईश्वर को परम पुरुष कहा गया है। वे दोनों शक्ति और परम पुरुष परमानन्दमय स्वरूप में होकर काशी क्षेत्र में रमण करने लगे। पाँच कोस के क्षेत्रफल वाले काशी क्षेत्र को शिव और पार्वती ने प्रलयकाल में भी कभी त्याग नहीं किया है। इसी कारण उस क्षेत्र को ‘अविमुक्त’ क्षेत्र कहा गया है। जिस समय इस भूमण्डल की, जल की तथा अन्य प्राकृतिक पदार्थों की सत्ता (अस्तित्त्व) नहीं रह जाती है, उस समय में अपने विहार के लिए भगवान जगदीश्वर शिव ने इस काशी क्षेत्र का निर्माण किया था। स्कन्द (कार्तिकेय) ने अगस्त्य जी को बताया कि यह काशी क्षेत्र भगवान शिव के आनन्द का कारण है, इसीलिए पहले उन्होंने इसका नाम ‘आनन्दवन’ रखा था।

काशी क्षेत्र के रहस्य को ठीक-ठीक कोई नहीं जान पाता है। उन्होंने कहा कि उस आनन्दकानन में जो यत्र-तत्र (इधर-उधर) सम्पूर्ण शिवलिंग हैं, उन्हें ऐसा समझना चाहिए कि वे सभी लिंग आनन्दकन्द रूपी बीजो से अंकुरित (उगे) हुए हैं।

पुरुषोत्तम
उसके बाद भगवान शिव ने माँ जगदम्बा के साथ अपने बायें अंग में अमृत बरसाने वाली अपनी दृष्टि डाली। उस दृष्टि से अत्यन्त तेजस्वी तीनो लोकों में अतिशय सुन्दर एक पुरुष प्रकट हुआ। वह अत्यन्त शान्त, सतो गुण से परिपूर्ण तथा सागर से भी अधिक गम्भीर और पृथ्वी के समान श्यामल था तथा उसके बड़े-बड़े नेत्र कमल के समान सुन्दर थे। अत्यन्त कमनीय और रमणीय होते हुए भी प्रचण्ड बाहुओं से सुशोभित वह पुरुष सुर्वण रंग के दो पीताम्बरों से अपने शरीर को ढँके हुए था। उसके नाभि कमल से बहुत ही मनमोहक सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी। देखने में वह अकेले ही सम्पूर्ण गुणों की खान तथा समस्त कलाओं का ख़ज़ाना प्रतीत होता था। वह एकाकी ही जगत के सभी पुरुषों में उत्तम था, इसलिए उसे ‘पुरुषोत्तम’ कहा गया।


सब गुणों से विभूषित उस महान पुरुष को देखकर महादेव जी ने उससे कहा– ‘अच्युत! तुम महाविष्णु हो। तुम्हारे नि:श्वास (सांस) से वेद प्रकट होंगे, जिनके द्वारा तुम्हें सब कुछ ज्ञान हो जाएगा अर्थात तुम सर्वज्ञ बन जाओगे।’ इस प्रकार महाविष्णु को कहने के बाद भगवान शंकर (पार्वती) के साथ विचरण करने हेतु आनन्दवन में प्रवेश कर गये।

पुरुषोत्तम भगवान विष्णु जब ध्यान में बैठे, तो उनका मन तपस्या में लग गया। उन्होंने अपने चक्र से एक सुन्दर पुष्करिणी (सरोवर) खोदकर उसे अपने शरीर के पसीने से भर दिया। उसके बाद उस सरोवर के किनारे उन्होंने कठिन तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर पार्वती के साथ भगवान शिव वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने महाविष्णु से वर माँगने के लिए कहा, तो विष्णु ने भवानी सहित हमेशा उनके दर्शन की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव सदा दर्शन देने के वचन को स्वीकार करते हुए बोले कि मेरी मणिमय कर्णिका

यहाँ गिर पड़ी है, इसलिए यह स्थान 'मणिकर्णिका तीर्थ' के नाम से निवेदन किया कि चूँकि मुक्तामय (मणिमय) कुण्डल यहाँ गिरा है, इसलिए यह मुक्ति का प्रधान क्षेत्र माना जाये अर्थात अकथनीय ज्योति प्रकाशित होती रहे। इन कारणों से इसका दूसरा नाम ‘काशी’ भी स्वीकार हो। विष्णु ने आगे निवेदन किया कि ब्रह्मा से लेकर कीट-पतंग जितने भी प्रकार के जीव हैं, उन सबके काशी क्षेत्र में मरने पर मोक्ष की प्राप्ति अवश्य हो। उस मणिकर्णिका तीर्थ में स्नान, सन्ध्या, जप, हवन, पूजन, वेदाध्ययन, तर्पण, पिण्ड दान, दशमहादान, कन्यादान, अनेक प्रकार के यज्ञों, व्रतोद्यापन वृषोत्सर्ग तथा शिवलिंग स्थापना आदि शुभ कर्मों का फल मोक्ष के रूप में प्राप्त होवे। जगत में जितने भी क्षेत्र हैं, उनमें सर्वाधिक सुन्दर और शुभकारी हो तथा इस काशी का नाम लेने वाले भी पाप से मुक्त हो जायें।’
महाविष्णु की बातों को स्वीकार करते हुए शिव ने उन्हें आदेश दिया कि ‘आप विविध प्रकार की यथायोग्य सृष्टि करो और उनमें जो कुमार्ग पर चलने वाले दुष्टात्मा हैं, उनके संहार में भी कारण बनो। पाँच कोस के क्षेत्रफल में फैला यह काशीधाम मुझे अतिशय प्रिय है। मैं यहाँ सदा निवास करता हूँ, इसलिए इस क्षेत्र में सिर्फ़ मेरी ही आज्ञा चलती है, यमराज आदि किसी अन्य की नहीं। इस 'अविमुक्त' क्षेत्र में रहने वाला पापी हो अथवा धर्मात्मा उन सबका शासक अकेला मैं ही हूँ। काशी से दूर रहकर भी जो मनुष्य मानसिक रूप से इस क्षेत्र का स्मरण करता है, उसे पाप स्पर्श नहीं करता है और वह काशी क्षेत्र में पहुँच कर उसके पुण्य के प्रभाव से मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। जो कोई संयमपूर्वक काशी में बहुत दिनों तक निवास करता है, किन्तु संयोगवश उसकी मृत्यु काशी से बाहर हो जाती है, तो वह भी स्वर्गीय सुख को प्राप्त करता है और अन्त में पुन: काशी में जन्म लेकर मोक्ष पद को प्राप्त करता है।
 

सर्वव्यापी शिव जो मनुष्य श्री काशी विश्वनाथ की प्रसन्नता के लिए इस क्षेत्र में दान देता है, वह धर्मात्मा भी अपने जीवन को धन्य बना लेता है। पंचक्रोशी (पाँच कोस की) अविमुक्त क्षेत्र विश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध एक ज्योतिर्लिंग का स्वरूप ही जानना और मानना चाहिए। भगवान विश्वनाथ काशी में स्थित होते हुए भी सर्वव्यापी होने के कारण सूर्य की तरह सर्वत्र उपस्थित रहते हैं। जो कोई उस क्षेत्र की महिमा से अनजान है अथवा उसमें श्रद्धा नहीं है, फिर भी वह जब काशीक्षेत्र में प्रवेश करता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो वह निष्पाप होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। यदि कोई मनुष्य काशी में रहते हुए पापकर्म करता है, तो मरने के बाद वह पहले 'रुद्र पिशाच' बनता है, 'उसके बाद उसकी मुक्ति होती है’

स्कन्द पुराण के अनुसार
स्कन्द पुराण के इस आख्यान से स्पष्ट होता है कि श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या आदि से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहाँ निराकार परब्रह्म परमेश्वर महेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए। उन्होंने दूसरी बार महाविष्णु की तपस्या के फलस्वरूप प्रकृति और पुरुष (शक्ति और शिव) के रूप में उपस्थित होकर आदेश दिया। महाविष्णु के आग्रह पर ही भगवान शिव ने काशी क्षेत्र को अविमुक्त कर दिया। उनकी लीलाओं पर ध्यान देने से काशी के साथ उनकी अतिशय प्रियशीलता स्पष्ट मालूम होती है। इस प्रकार द्वादश ज्योतिर्लिंग में श्री विश्वेश्वर भगवान विश्वनाथ का शिवलिंग सर्वाधिक प्रभावशाली तथा अद्भुत शक्तिसम्पन्न लगता है। माँ अन्नापूर्णा (पार्वती) के साथ भगवान शिव अपने त्रिशूल पर काशी को धारण करते हैं और कल्प के प्रारम्भ में अर्थात सृष्टि रचना के प्रारम्भ में उसे त्रिशूल से पुन: भूतल पर उतार देते हैं।
 

विश्वनाथ मन्दिर, वाराणसी
शिव महापुराण में श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा कुछ इस प्रकार बतायी गई है– 'परमेश्वर शिव ने माँ पार्वती के पूछने पर स्वयं अपने मुँह से श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा कही थी। उन्होंने कहा कि वाराणसी पुरी हमेशा के लिए गुह्यतम अर्थात अत्यन्त रहस्यात्मक है तथा सभी प्रकार के जीवों की मुक्ति का कारण है। इस पवित्र क्षेत्र में सिद्धगण शिव-आराधना का व्रत लेकर अनेक स्वरूप बनाकर संयमपूर्वक मेरे लोक की प्राप्ति हेतु महायोग का नाम 'पाशुपत योग' है। पाशुपतयोग भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रकार का फल प्रदान करता है।

भगवान शिव ने कहा कि मुझे काशी पुरी में रहना सबसे अच्छा लगता है, इसलिए मैं सब कुछ छोड़कर इसी पुरी में निवास करता हूँ। जो कोई भी मेरा भक्त है और जो कोई मेरे शिवतत्त्व का ज्ञानी है, ऐसे दोनों प्रकार के लोग मोक्षपद के भागी बनते हैं, अर्थात उन्हें मुक्ति अवश्य प्राप्त होती है। इस प्रकार के लोगों को न तो तीर्थ की अपेक्षा रहती है और न विहित अविहित कर्मों का प्रतिबन्ध। इसका तात्पर्य यह है कि उक्त दोनों प्रकार के लोगों को जीवन्मुक्त मानना चाहिए। वे जहाँ भी मरते हैं, उन्हें तत्काल मुक्ति प्राप्त होती है। भगवान शिव ने माँ पार्वती को बताया कि बालक, वृद्ध या जवान हो, वह किसी भी वर्ण, जाति या आश्रम का हो, यदि अविमुक्त क्षेत्र में मृत्यु होती है, तो उसे अवश्य ही मुक्ति मिल जाती है। स्त्री यदि अपवित्र हो या पवित्र हो, वह कुमारी हो, विवाहिता हो, विधवा हो, बन्ध्या, रजस्वला, प्रसूता हो अथवा उसमें संस्कारहीनता हो, चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, यदि उसकी मृत्यु काशी क्षेत्र में होती है, तो वह अवश्य ही मोक्ष की भागीदार बनती है।

शिव पुराण के अनुसार

शिव महापुराण के अनुसार इस पृथ्वी पर जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्गुण, निर्विकार तथा सनातन ब्रह्मस्वरूप ही है। अपने कैवल्य (अकेला) भाव में रमण करने वाले अद्वितीय परमात्मा में जब एक से दो बनने की इच्छा हुई, तो वही सगुणरूप में ‘शिव’ कहलाने लगा। शिव ही पुरुष और स्त्री, इन दो हिस्सों में प्रकट हुए और उस पुरुष भाग को शिव तथा स्त्रीभाग को ‘शक्ति’ कहा गया। उन्हीं सच्चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्ति ने अदृश्य रहते हुए स्वभाववश प्रकृति और पुरुषरूपी चेतन की सृष्टि की। प्रकृति और पुरुष सृष्टिकर्त्ता अपने माता-पिता को न देखते हुए संशय में पड़ गये। उस समय उन्हें निर्गुण ब्रह्म की आकाशवाणी सुनाई पड़ी– ‘तुम दोनों को तपस्या करनी चाहिए, जिससे कि बाद में उत्तम सृष्टि का विस्तार होगा।’ उसके बाद भगवान शिव ने तप:स्थली के रूप में तेजोमय पाँच कोस के शुभ और सुन्दर एक नगर का निर्माण किया, जो उनका ही साक्षात रूप था। उसके बाद उन्होंने उस नगर को प्रकृति और पुरुष के पास भेजा, जो उनके समीप पहुँच कर आकाश में ही स्थित हो गया। तब उस पुरुष (श्री हरि) ने उस नगर में भगवान शिव का ध्यान करते हुए सृष्टि की कामना से वर्षों तपस्या की। तपस्या में श्रम होने के कारण श्री हरि (पुरुष) के शरीर से श्वेतजल की अनेक धाराएँ फूट पड़ीं, जिनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया। वहाँ उसके अतिरकित कुछ भी दिखाई नहीं देता था। उसके बाद भगवान विष्णु (श्री हरि) मन ही मन विचार करने लगे कि यह कैसी विचित्र वस्तु दिखाई देती है। उस आश्चर्यमय दृश्य को देखते हुए जब उन्होंने अपना सिर हिलाया, तो उनके एक कान से मणि खिसककर गिर पड़ी। मणि के गिरने से वह स्थान ‘मणिकर्णिका-तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

उस महान जलराशि में जब पंचक्रोशी डूबने लगी, तब निर्गुण निर्विकार भगवान शिव ने उसे शीघ्र ही अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया। तदनन्तर विष्णु (श्रीहरि) अपनी पत्नी (प्रकृति) के साथ वहीं सो गये। उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ, जिससे ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति में भी निराकार शिव का निर्देश ही कारण था। उसके बाद ब्रह्मा जी ने शिव के आदेश से विलक्षण सृष्टि की रचना प्रारम्भ कर दी। ब्रह्मा जी ने ब्रह्माण्ड का विस्तार (विभाजन) चौदह भुवनों में किया, जबकि ब्रह्माण्ड का क्षेत्रफल पचास करोड़ योजन बताया गया है। भगवान शिव ने विचार किया कि ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत कर्मपाश (कर्बन्धन) में फँसे प्राणी मुझे कैसे प्राप्त हो सकेंगे? उस प्रकार विचार करते हुए उन्होंने पंचक्रोशी को अपने त्रिशूल से उतार कर इस जगत में छोड़ दिया।

काशी में स्वयं परमेश्वर ने ही अविमुक्त लिंग की स्थापना की थी, इसलिए उन्होंने अपने अंशभूत हर (शिव) को यह निर्देश दिया कि तुम्हें उस क्षेत्र का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। यह पंचक्रोशी लोक का कल्याण करने वाली, कर्मबन्धनों को नष्ट करने वाली, ज्ञान प्रकाश करने वाली तथा प्राणियों के लिए मोक्षदायिनी है। यद्यपि ऐसा बताया गया है कि ब्रह्मा जी का एक दिन पूरा हो जाने पर इस जगत् का प्रलय हो जाता है, फिर भी अविमुक्त काशी क्षेत्र का नाश नहीं होता है, क्योंकि उसे भगवान परमेश्वर शिव अपने त्रिशूल पर उठा लेते हैं। ब्रह्मा जी जब नई सृष्टि प्रारम्भ करते हैं, उस समय भगवान शिव काशी को पुन: भूतल पर स्थापित कर देते हैं। कर्मों का कर्षण (नष्ट) करने के कारण ही उस क्षेत्र का नाम ‘काशी’ है, जहाँ अविमुक्तेश्वरलिंग हमेशा विराजमान रहता है। संसार में जिसको कहीं गति नहीं मिलती है, उसे वाराणसी में गति मिलती है। महापुण्यमयी पंचक्रोशी करोड़ों हत्याओं के दुष्फल का विनाश करने वाली है। भगवान शंकर की यह प्रिय नगरी समानरूप से भोग ओर मोक्ष को प्रदान करती है। कालाग्नि रुद्र के नाम से विख्यात कैलासपति शिव अन्दर से सतोगुणी तथा बाहर से तमोगुणी कहलाते हैं। यद्यपि वे निर्गुण हैं, किन्तु जब सगुण रूप में प्रकट होते हैं, तो ‘शिव’ कहलाते हैं। रुद्र ने पुन: पुन: प्रणाम करके निर्गुण शिव से कहा– ‘विश्वनाथ’ महेश्वर! निस्सन्देह मैं आपका ही हूँ। मुझ आत्मज (पुत्र) पर आप कृपा कीजिए। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, आप लोककल्याण की कामना से जीवों का उद्धार करने के लिए यहीं विराजमान हों।’ इसी प्रकार स्वयं अविमुक्त क्षेत्र ने भी शंकर जी से प्रार्थना की है। उसने कहा– ‘देवाधिदेव’ महादेव वास्तव में आप ही तीनों लोकों के स्वामी हैं और ब्रह्मा तथा विष्णु आदि के द्वारा पूजनीय हैं। आप काशीपुरी को अपनी राजधानी के रूप में स्वीकार करें। मैं यहाँ स्थिर भाव से बैठा हुआ सदा आपका ध्यान करता रहूँगा। सदाशिव! आप उमा सहित यहाँ सदा विराजमान रहें और अपने भक्तों का कार्य सिद्ध करते हुए समस्त जीवों के संसार सागर से पार करें। इस प्रकार भगवान शिव अपने गणों सहित काशी में विराजमान हो गये। तभी से काशी पुरी सर्वश्रेष्ठ हो गई। उक्त आशय को ही शिव पुराण में इस प्रकार कहा गया है–
देवदेव महादेव कालामयसुभेषज।
त्वं त्रिलोकपति: सत्यं सेव्यो ब्रह्माच्युतादिभि:।।
काश्यां पुर्यां त्वया देव राजधानी प्रगृह्यताम्।
मया ध्यानतया स्थेयमचिन्त्यसुखहेतवे।।
मुक्तिदाता भवानेव कामदश्च न चापर:।
तस्मात्त्वमुपकाराय तिष्ठोमासहित: सदा।।
जीवान्भवाष्धेरखिलास्तारय त्वं सदाशिव।
भक्तकार्य्यं कुरू हर प्रार्थयामि पुन: पुन:।।
इत्येवं प्रार्थितस्तेन विश्वनाथेन शंकर:।
लोकानामुपकारार्थं तस्थौ तत्रापि सर्वराट्।।[3]
परिवहन व्यवस्था


उत्तर भारत में अवस्थित श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए वाराणसी शहर में आना होता है। देश-विदेश के लोगों के लिए यातायात-व्यवस्था अच्छी है। धार्मिक जनता अपनी सुविधा के अनुसार रेल, बस, हवाई जहाज, टैक्सी आदि से मनचाही यात्रा कर सकती है।

धार्मिक भावनायें
जो वर्षों से काशी नगरी में निवास कर रहा हो और उसकी आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो गई हो, फिर भी वह काशी छोड़कर दूर नहीं जाना चाहता है। शास्त्रकारों ने लिखा है कि जिस स्थान पर मृत्यु मंगलदायक, भस्म का त्रिपुण्ड (तिलक) ही अलंकार है, लंगोटी ही जहाँ रेशमी वस्त्र के समान है, ऐसी काशी का सेवन कौन नहीं करना चाहेगा?

मरणं मंगलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्।
कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते।।

आज भी गंगा के किनारे दशाश्वमेध-घाट पर एक सामान्य व्यक्ति भी यह कहते मिल जाता है कि–

चना चबेना गंगजल, जो पूरवे करतार।
काशी कभी न छोड़ियो, बाबा विश्वनाथ दरबार।।


इस प्रकार माँ गंगा के किनारे बसी हुई श्री माँ अन्नपूर्णा सहित भोलेनाथ बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी अतीव दिव्य है, मोक्षदायिका है और तीनों लोकों से विलक्षण है। श्री विश्वेश्वर विश्वनाथ का यह ज्योतिर्लिंग साक्षात भगवान परमेश्वर महेश्वर का स्वरूप है, यहाँ भगवान शिव सदा विराजमान रहते हैं।




हर हर महादेव.....
बाबा विश्वनाथ विजयते तराम 
श्री काशी विश्‍वनाथ ज्‍योतिर्लिंग लाइव दर्शन    


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महाशिवरात्रि के लिए पशुपतिनाथ

काठमांडू,एजेंसी। हिंदुओं के प्रमुख पर्व महाशिवरात्रि के अवसर पर भारत और नेपाल के करीब सात लाख श्रद्धालुओं के पशुपतिनाथ मंदिर पहुंचने की संभावना है. इस दौरान नागा बाबाओं द्वारा भगवान शिव की विशेष प्रकार से की जाने वाली अराधना विशेष आकर्षण होगा.
पशुपति क्षेत्र विकास ट्रस्ट के सदस्य सचिव गोविंदा टंडन ने बताया कि, “इस साल महाशिवरात्रि के उत्सव के दौरान हमें भारत और नेपाल से करीब सात लाख हिंदू श्रद्धालुओं के पशुपतिनाथ मंदिर पहुंचने की उम्मीद है.”
टंडन ने कहा कि इनमें से करीब पांच हजार साधु और बाबा भी होंगे, जो भारत के विभिन्न स्थानों से पहुंचेंगे. इस दौरान भारतीय कलाकारों का एक दल संगीत और धार्मिक कार्यक्रम पस्तुत करेगा.मंदिर अधिकारियों को हालांकि इस दौरान श्रद्धालुओं की लंबी कतार को संभालना होगा.
टंडन ने हालांकि कहा कि जो लोग लंबी कतार से बचना चाहते हैं, वे 1000 नेपाली रुपये (625 भारतीय रुपये) की भेंट चढ़ाकर कुछ ही मिनट में दर्शन कर सकते हैं.
उनके मुताबिक इस दिन मंदिर को करोड़ों रुपये की आय होती है. कई श्रद्धालु सोने और अन्य महंगी धातुएं भी चढ़ाते हैं.उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की सहायता के लिए भारतीय स्टेट बैंक और नेपाल निवेश बैंक ने मंदिर के अंदर अपने काउंटर और एटीएम मशीन लगाए हैं.उनके मुताबिक साधु और बाबा काठमांडू में पहुंचने लगे हैं.इस दौरान सुरक्षा का भी प्रबंध किया जाएगा और करीब 3,000 सुरक्षाकर्मी तथा 10,000 स्वयंसेवकों को तैनात किया जाएगा.
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 काठमांडू,एजेंसी। हिंदुओं के प्रमुख पर्व महाशिवरात्रि के अवसर पर भारत और नेपाल के करीब सात लाख श्रद्धालुओं के पशुपतिनाथ मंदिर पहुंचने की संभावना है. इस दौरान नागा बाबाओं द्वारा भगवान शिव की विशेष प्रकार से की जाने वाली अराधना विशेष आकर्षण होगा.

पशुपति क्षेत्र विकास ट्रस्ट के सदस्य सचिव गोविंदा टंडन ने बताया कि, “इस साल महाशिवरात्रि के उत्सव के दौरान हमें भारत और नेपाल से करीब सात लाख हिंदू श्रद्धालुओं के पशुपतिनाथ मंदिर पहुंचने की उम्मीद है.”
टंडन ने कहा कि इनमें से करीब पांच हजार साधु और बाबा भी होंगे, जो भारत के विभिन्न स्थानों से पहुंचेंगे. इस दौरान भारतीय कलाकारों का एक दल संगीत और धार्मिक कार्यक्रम पस्तुत करेगा.मंदिर अधिकारियों को हालांकि इस दौरान श्रद्धालुओं की लंबी कतार को संभालना होगा.
टंडन ने हालांकि कहा कि जो लोग लंबी कतार से बचना चाहते हैं, वे 1000 नेपाली रुपये (625 भारतीय रुपये) की भेंट चढ़ाकर कुछ ही मिनट में दर्शन कर सकते हैं.
उनके मुताबिक इस दिन मंदिर को करोड़ों रुपये की आय होती है. कई श्रद्धालु सोने और अन्य महंगी धातुएं भी चढ़ाते हैं.उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की सहायता के लिए भारतीय स्टेट बैंक और नेपाल निवेश बैंक ने मंदिर के अंदर अपने काउंटर और एटीएम मशीन लगाए हैं.उनके मुताबिक साधु और बाबा काठमांडू में पहुंचने लगे हैं.इस दौरान सुरक्षा का भी प्रबंध किया जाएगा और करीब 3,000 सुरक्षाकर्मी तथा 10,000 स्वयंसेवकों को तैनात किया जाएगा.



शिवरात्रि का त्योहार गुरुवार को मनाया जाएगा. नेपाल के काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में शिवभक्तों के जुटने का सिलसिला शुरू हो गया है. इस तस्वीर में साधुओं को हारमोनियम की ताल पर भजन-कीर्तन करते देखा जा सकता है.


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’ॐ नमः शिवाय' मंत्र में सृष्टि समाई

शिव और मंत्र का वाच्य वाचक भाव अनादिकाल से चला आ रहा है। जैसे यह घोर संसार सागर अनादिकाल से चला आ रहा है, उसी प्रकार संसार से छ़ुडानेवाले भगवान शिव भी अनादिकाल से ही नित्य विराजमान हैं। जैसे औषध रोगों का स्वभावतः शत्रु है, उसी प्रकार भगवान शिव संसार दोषों के स्वाभाविक शत्रु माने गए हैं।

शिव पुराण संहिता में कहा है कि सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए इस 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का प्रतिपादन किया है। यह आदि षडाक्षर मंत्र संपूर्ण विद्याओं का बीज है। जैसे वट बीज में महान वृक्ष छिपा हुआ है, उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है।
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लिंगाष्टकम – Sri Shiva Lingashtakam

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिङ्गं
निर्मलभासित शॊभित लिङ्गम् ।
जन्मज दुःख विनाशक लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 1 ॥

दॆवमुनि प्रवरार्चित लिङ्गं
कामदहन करुणाकर लिङ्गम् ।
रावण दर्प विनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 2 ॥

सर्व सुगन्ध सुलॆपित लिङ्गं
बुद्धि विवर्धन कारण लिङ्गम् ।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 3 ॥

कनक महामणि भूषित लिङ्गं
फणिपति वॆष्टित शॊभित लिङ्गम् ।
दक्ष सुयज्ञ निनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 4 ॥

कुङ्कुम चन्दन लॆपित लिङ्गं
पङ्कज हार सुशॊभित लिङ्गम् ।
सञ्चित पाप विनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 5 ॥

दॆवगणार्चित सॆवित लिङ्गं
भावै-र्भक्तिभिरॆव च लिङ्गम् ।
दिनकर कॊटि प्रभाकर लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 6 ॥

अष्टदलॊपरिवॆष्टित लिङ्गं
सर्वसमुद्भव कारण लिङ्गम् ।
अष्टदरिद्र विनाशन लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 7 ॥

सुरगुरु सुरवर पूजित लिङ्गं
सुरवन पुष्प सदार्चित लिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मक लिङ्गं
तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 8 ॥

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठॆश्शिव सन्निधौ ।
शिवलॊकमवाप्नॊति शिवॆन सह मॊदतॆ ॥

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जयति जयति श्री शंकर

जयति जयति श्री शंकर
जयति जयति जग-निवास, शंकर सुखकारी ।।
अजर अमर अज अरुप, सत चित आनंदरुप,
व्यापक ब्रह्मस्वरुप, भव ! भव-भय-हारी ।।
शोभित बिधुबाल भाल, सुरसरिमय जटाजाल,
तीन नयन अति विशाल, मदन-दहन-कारी ।।
भक्तहेतु धरत शूल, करत कठिन शूल फूल,
हियकी सब हरत हूल, अचल शान्तिकारी ।।
जयति जयति जग-निवास, शंकर सुखकारी ।।
अमल अरुण चरण कमल, सफल करत काम सकल,
भक्ति-मुक्ति देत विमल, माया-भ्रम-टारी ।।
कार्तिकेययुत गणेश, हिमतनया सह महेश,
राजत कैलाश-देश, अकल कलाधारी ।।
भूषण तन भूति व्याल, मुण्डमाल कर कपाल,
सिंह-चर्म हस्ति खाल, डमरु कर धारी ।।
अशरण जन नित्य शरण, आशुतोष आर्तिहरण,
सब विधि कल्याण-करण, जय जय त्रिपुरारी ।।
जयति जयति जग-निवास, शंकर सुखकारी ।।
जय भोलेनाथ सदाशिव शंकर
ॐ नमः शिवाय




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शिव ताण्डव स्तोत्र


शिव ताण्डव स्तोत्र (संस्कृत:शिवताण्डवस्तोत्रम्) महान विद्वान एवं परम शिवभक्त लंकाधिपति रावण द्वारा विरचित भगवान शिव का स्तोत्र है।
कथा
मान्यता है कि रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को उद्यत हुआ तो भोले बाबा ने अपने अंगूठे से तनिक सा जो दबाया तो कैलाश फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ दब गया और वह आर्तनाद कर उठा - "शंकर शंकर" - अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया; जो कालांतर में शिव तांडव स्त्रोत्र कहलाया।
काव्य शैली
शिवताण्डव स्तोत्र स्तोत्रकाव्य में अत्यन्त लोकप्रिय है। यह पञ्चचामर छन्द में आबद्ध है। इसकी अनुप्रास और समास बहुल भाषा संगीतमय ध्वनि और प्रवाह के कारण शिवभक्तों में प्रचलित है। सुन्दर भाषा एवं काव्य-शैली के कारण यह स्तोत्रों विशेषकर शिवस्तोत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है।


स्तोत्र
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले, गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं, चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥१॥
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी, विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके, किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥
धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥४॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिङ्गभा-निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥
प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा-विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमस्फुरद्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकमस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
॥ इति शिव ताण्डव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

यट्यूब वीडियो
- गायक रमेश भाई ओझा, टैक्स्ट सहित

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शिव भक्तों से रंगी काशी, ऊँ नम: शिवाय

बनारस आज ( शिव भक्तों से रंगी काशी, ऊँ नम: शिवाय , ऊँ नम: शिवाय ,हर हर बोलो नम: शिवाय..)


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रुद्राष्टकम्

रुद्राष्टक (संस्कृत:श्रीरुद्राष्टकम्) स्त्रोत महाज्ञानी लंकेश्वर महाराज रावण द्वारा भगवान शिव की स्तुति हेतु रचित एवं प्रथम गायित है। इसका उल्लेख श्रीरामचरितमानस के उत्तर कांड में आता है।

शिव रुद्राष्टक

शिव की यह उपासना तुलसीदास की रामचरितमानस से है।

नमामिशमीशान निर्वाण रूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥

निजं निर्गुणं निर्किल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं॥
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोहं॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गंभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेंदु कंठे भुजंगा॥
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठ दयालं॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥
त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानंदसंदोह मोहपहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां॥
न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥
जरा जन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमाशीश शंभो॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
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द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रम

द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रम्
__________________

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।
भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये।।1।।

श्रीशैलशृंगे विबुधातिसंगे तुलाद्रितुंगेऽपि मुदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम्।।2।।

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।3।।

कावेरिकानर्मदयो: पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोंकारमीशं शिवमेकमीडे।।4।।

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम्।
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि।।5।।

याम्ये सदंगे नगरेतिऽरम्ये विभूषितांगम् विविधैश्च भोगै:।
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये।।6।।

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यै: केदारमीशं शिवमेकमीडे।।7।।

सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे।
यद्दर्शनात् पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्रयम्बकमीशमीडे।।8।।

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यै:।
श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि।।9।।

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि।।10।।

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये।।11।।

लापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरं स्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये॥ 12॥

ज्योतिर्मयद्वादशलिंगकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण।
स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च॥ 13॥





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बनारस शिव से कभी मुक्त नही, जब से आये कैलाश न गये। बनारसी की मस्ती को लिखा नही जा सकता अनुभव होता है। अद्भूद है ये शहर जिन्दगी जीनेका तरीका कुछ ठहरा हुआ है पर सुख ठहराव में है द्रुतविलंबित में नही. मध्यम में है इसको जीनेवाला है यह नगर। नटराज यहां विश्वेश्वर के रुप में विराजते है इसलिये श्मशान पर भी मस्ती का आलम है। जनजन् शंकरवत् है। इस का अनुभव ही आनन्द है ये जान कर जीना बनारस का जीना है जीवन रस को बना के जीना है।
Copyright © 2014 बनारसी मस्ती के बनारस वाले Designed by बनारसी मस्ती के बनारस वाले
Converted to blogger by बनारसी राजू ;)
काल हर !! कष्ट हर !! दुख हर !! दरिद्र हर !! हर हर महादेव !! ॐ नमः शिवाय.. वाह बनारस वाह !!